Bangladesh ISI Office: बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसने भारत की चिंताओं को बढ़ा दिया है। सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI को अब ढाका में अपना दफ्तर खोलने की अनुमति मिल गई है। बताया जा रहा है कि यह दफ्तर पाकिस्तान हाई कमीशन परिसर में खोला जाएगा। इस कदम को दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थिति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश के इस निर्णय से भारत की पूर्वोत्तर सीमा सुरक्षा पर दबाव बढ़ सकता है। माना जा रहा है कि ISI की मौजूदगी का उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर राज्यों—विशेषकर पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा—में अस्थिरता फैलाना हो सकता है। सूत्रों के अनुसार, यह पाकिस्तान की पुरानी “ब्लूप्रिंट नीति” का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य भारत के सीमावर्ती इलाकों में जासूसी नेटवर्क को सक्रिय करना है।
2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद, देश में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। तब से यूनुस प्रशासन के पाकिस्तान के साथ संबंध लगातार मजबूत होते दिख रहे हैं। हाल ही में पाकिस्तान के ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी चेयरमैन जनरल शाहिद शामशाद मिर्जा और उनका प्रतिनिधिमंडल ढाका पहुंचा था।
दोनों देशों के बीच उस समय व्यापार, निवेश और रक्षा सहयोग पर चर्चा हुई। पाकिस्तान ने बांग्लादेश को कराची पोर्ट के उपयोग की अनुमति भी दी। विश्लेषकों का कहना है कि यह यूनुस सरकार और पाकिस्तान के बीच “नई दोस्ती” का संकेत था। अब ISI दफ्तर की मंजूरी उसी संबंध की ‘कूटनीतिक सौगात’ के रूप में देखी जा रही है।
नई दिल्ली के लिए यह निर्णय भू-राजनीतिक और सुरक्षा दोनों मोर्चों पर चिंता का विषय है। भारत के खुफिया सूत्रों के अनुसार, ढाका में ISI की मौजूदगी से सीमा पार जासूसी और आतंकी गतिविधियों में वृद्धि की संभावना है। पहले भी पूर्वोत्तर राज्यों में पाकिस्तान समर्थित संगठनों की सक्रियता देखी जा चुकी है। अब इस कदम से ऐसे नेटवर्क को नई ताकत मिल सकती है।
एक वरिष्ठ सुरक्षा विशेषज्ञ के मुताबिक, “यह केवल कूटनीतिक कदम नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश है कि बांग्लादेश अब भारत की पारंपरिक सुरक्षा नीति को चुनौती देने के लिए तैयार है।”
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने भी इस फैसले पर चिंता जताई है। उनका मानना है कि ISI का दफ्तर ढाका में खुलना, दक्षिण एशिया में नई जासूसी प्रतिस्पर्धा को जन्म देगा। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों की खुफिया एजेंसियां भी इस विकास पर करीबी नजर रखे हुए हैं।
मोहम्मद यूनुस प्रशासन का यह कदम बांग्लादेश की विदेश नीति में ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। हालांकि, भारत के लिए यह न सिर्फ एक कूटनीतिक चुनौती है, बल्कि एक सुरक्षा अलार्म भी। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली इस बदलते परिदृश्य का जवाब किस तरह देती है।
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