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ISRO PSLV Failure: पीएसएलवी की बार-बार विफलता के पीछे क्या कोई बड़ी साजिश है? जानिए सच।

ISRO PSLV Failure: भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में ‘वर्कहॉर्स’ के नाम से मशहूर पीएसएलवी (PSLV) रॉकेट की साख दांव पर लगी है। पिछले कुछ समय में मिली बार-बार की विफलताओं ने केंद्र सरकार और इसरो के वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। अंतरिक्ष एजेंसी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि रॉकेट की विफलता के विश्लेषण के लिए आंतरिक टीम के साथ-साथ इसरो से सेवानिवृत्त हुए दिग्गज वैज्ञानिकों की एक बाहरी समिति बनाई गई है। इस उच्च स्तरीय समिति का नेतृत्व इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ और प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के. विजय राघवन करेंगे। यह टीम तकनीकी खराबी के साथ-साथ संगठनात्मक कमियों की भी गहराई से जांच करेगी।

इतिहास में पहली बार: दो मिशनों की लगातार विफलता

पीएसएलवी के पिछले 32 वर्षों के गौरवशाली सफर में यह पहला मौका है जब इसके दो मिशन एक के बाद एक विफल हुए हैं। पहला झटका 18 मई 2025 को लगा, जब ‘पीएसएलवी सी-61’ प्रक्षेपण के महज 6 मिनट 20 सेकंड बाद अपने पथ से भटक गया। यह रॉकेट सीमाओं की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण उपग्रह EOS-09 ले जा रहा था। इसके ठीक बाद, 12 जनवरी 2026 को ‘पीएसएलवी सी-62’ के साथ भी ठीक उसी समय (6 मिनट 20 सेकंड) पर वही अनहोनी हुई। इस दूसरे फेलियर के कारण डीआरडीओ का ‘अन्वेष’ उपग्रह और 15 अन्य छोटे सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में स्थापित नहीं हो सके और मिशन तबाह हो गया।

जांच का दायरा: क्या संगठनात्मक कारण हैं जिम्मेदार?

इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन को अप्रैल तक सौंपी जाने वाली यह रिपोर्ट केवल तकनीकी पहलुओं तक सीमित नहीं रहेगी। समिति इस बात की भी पड़ताल करेगी कि क्या रॉकेट के निर्माण, कलपुर्जों की खरीद और असेंबली की प्रक्रिया में कोई ढांचागत समस्या तो नहीं आ गई है। चूंकि अब अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ गई है, इसलिए जवाबदेही तय करने की मौजूदा प्रणाली की भी समीक्षा की जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि पीएसएलवी की विफलता का असर अन्य रॉकेट कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि कई रॉकेटों में समान घटकों का उपयोग किया जाता है।

एस. सोमनाथ पर भरोसा: ‘नॉटी ब्वॉय’ को ‘बाहुबली’ बनाने वाले विशेषज्ञ

समिति में एस. सोमनाथ का शामिल होना इसरो के लिए उम्मीद की किरण है। सोमनाथ को रॉकेट प्रणाली, विशेषकर तरल इंजन और सिस्टम इंजीनियरिंग का विशेषज्ञ माना जाता है। उल्लेखनीय है कि जब जीएसएलवी (GSLV) रॉकेट को बार-बार फेल होने के कारण ‘नॉटी ब्वॉय’ कहा जाने लगा था, तब सोमनाथ ने ही इसकी कमान संभाली थी और इसे इसरो का सबसे विश्वसनीय रॉकेट ‘बाहुबली’ बनाया था। 1985 में अपने करियर की शुरुआत पीएसएलवी प्रोजेक्ट से करने वाले सोमनाथ अब अपनी सेवानिवृत्ति के बाद इस रॉकेट को एक बार फिर सही रास्ते पर लाने की चुनौती स्वीकार कर चुके हैं।

आगामी लॉन्च पर असर: सुरक्षा पहले, प्रक्षेपण बाद में

इन विफलताओं के कारण भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के शेड्यूल में बदलाव होना तय है। इसरो के सूत्रों का कहना है कि जब तक विशेषज्ञ समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट नहीं दे देती और विफलता के कारणों को पूरी तरह ठीक नहीं कर लिया जाता, तब तक अगले पीएसएलवी प्रक्षेपण पर रोक लगी रहेगी। हालांकि इसरो के पास अन्य प्रक्षेपण यान मौजूद हैं, लेकिन पीएसएलवी की एक और विफलता एजेंसी की वैश्विक छवि और व्यावसायिक हितों को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। इसीलिए, इस बार हर छोटे से छोटे पुर्जे की बारीकी से जांच की जा रही है।

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