Jharkhand HC: झारखंड की राजनीति और न्यायिक गलियारों में आज एक बड़ा मोड़ आया है। माननीय झारखंड उच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एयरपोर्ट थाना कांड संख्या 05/2026 से संबंधित सभी कानूनी कार्यवाहियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। अदालत ने इस मामले की सुनवाई के दौरान न केवल राज्य सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए, बल्कि कानून के दुरुपयोग को लेकर कड़ी नाराजगी भी जाहिर की। यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब केंद्रीय एजेंसी के अधिकारियों पर राज्य पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज किया गया था।
अदालत की सख्त टिप्पणी: कानून के “खुले दुरुपयोग” पर लगाई फटकार
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य की मशीनरी को कड़ी फटकार लगाई। माननीय न्यायाधीश ने अपने अवलोकन में स्पष्ट रूप से कहा कि न्यायालय कानून के इस तरह के “खुले दुरुपयोग” की मूक दर्शक बनकर नहीं बैठ सकती। अदालत ने माना कि जिस तरह से केंद्रीय एजेंसी के अधिकारियों को निशाना बनाया गया, वह न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ है। उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि सत्ता का उपयोग किसी जांच को प्रभावित करने के लिए करना उचित नहीं है।
“काउंटर-ब्लास्ट” और दुर्भावनापूर्ण FIR का पर्दाफाश
हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण अवलोकन में इस FIR को एक दुर्भावनापूर्ण “काउंटर-ब्लास्ट” करार दिया। अदालत ने पाया कि यह पूरा मामला PMLA (धन शोधन निवारण अधिनियम) के एक आरोपी द्वारा रची गई साजिश का हिस्सा है। दरअसल, झारखंड में ₹23 करोड़ के पेयजल घोटाले की चल रही जांच को बाधित करने और जांच अधिकारियों पर दबाव बनाने के उद्देश्य से यह FIR दर्ज कराई गई थी। अदालत ने ED की उस दलील को स्वीकार किया कि यह मुकदमा केंद्रीय एजेंसी की निष्पक्ष जांच की राह में रोड़ा अटकाने का एक सुनियोजित प्रयास था।
ED कार्यालय और अधिकारियों की सुरक्षा के लिए कड़े निर्देश
जांच की संवेदनशीलता और अधिकारियों की जान को खतरे की संभावना को देखते हुए, हाईकोर्ट ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने का आदेश दिया है। अदालत ने जोनल कार्यालय और उसके अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त CISF (केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल) की तैनाती का निर्देश दिया है। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि जांच एजेंसियां बिना किसी बाहरी दबाव या भय के अपना काम जारी रख सकें।
गृह सचिव और SSP रांची को अदालत का अल्टीमेटम
न्यायालय ने इस मामले में झारखंड के गृह सचिव और रांची के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराया है। अदालत ने स्पष्ट आदेश जारी करते हुए कहा है कि रांची स्थित ED परिसर और उसके सभी अधिकारियों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। किसी भी अप्रिय स्थिति या जांच में व्यवधान की स्थिति में स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार माना जाएगा। अदालत ने साफ किया कि केंद्रीय संस्थाओं की गरिमा और सुरक्षा सर्वोपरि है।
न्यायिक हस्तक्षेप: निष्पक्ष जांच और संस्थागत गरिमा की रक्षा
झारखंड हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप न केवल कानून के गलत इस्तेमाल पर रोक लगाता है, बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी महत्वपूर्ण संस्था की गरिमा को भी सुरक्षित करता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से भविष्य में जांच एजेंसियों को “प्रतिशोध की राजनीति” से सुरक्षा मिलेगी। यह आदेश स्पष्ट संदेश देता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही किसी भी जांच को डराने-धमकाने या फर्जी मुकदमों के जरिए रोका नहीं जा सकता।
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