Jhiram Ghati Politics
Jhiram Ghati Politics: छत्तीसगढ़ की राजनीति में ‘झीरम घाटी हत्याकांड’ एक ऐसा घाव है जो समय-समय पर सियासी गलियारों में सुलगने लगता है। हाल ही में राज्य में नक्सलवाद के खात्मे को लेकर हो रही चर्चाओं के बीच, इस जघन्य वारदात पर एक बार फिर राज्य के दो दिग्गज पूर्व मुख्यमंत्रियों—डॉ. रमन सिंह और भूपेश बघेल—के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक, दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर तथ्यों को छिपाने और जांच में रोड़े अटकाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। झीरम घाटी का मुद्दा एक बार फिर छत्तीसगढ़ की राजनीति के केंद्र में आ गया है, जिससे प्रदेश का सियासी पारा चढ़ गया है।
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कांग्रेस नेता भूपेश बघेल पर सीधा हमला बोलते हुए उनके पुराने दावों की याद दिलाई। डॉ. रमन सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा कि चुनाव से पहले और विपक्ष में रहते हुए भूपेश बघेल अक्सर दावा करते थे कि झीरम घाटी हत्याकांड के पुख्ता सबूत उनकी जेब में हैं। रमन सिंह ने कटाक्ष करते हुए कहा, “डॉक्टर साहब (भूपेश बघेल) की जेब में सबूत होने की बात कही जाती थी, लेकिन जब भी वे जेब में हाथ डालते हैं, तो सबूत के नाम पर सिर्फ अखबार की एक पुरानी कतरन ही बाहर निकलती है।” उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अपने पांच साल के शासनकाल में केवल दोषारोपण की राजनीति की और जनता को गुमराह किया।
डॉ. रमन सिंह के हमले का जवाब देने में भूपेश बघेल ने भी देरी नहीं की। उन्होंने रमन सिंह को संबोधित करते हुए पलटवार किया और भाजपा सरकार पर जांच को बाधित करने का आरोप लगाया। बघेल ने लिखा, “आपकी पार्टी ने जांच होने ही कहाँ दी डॉक्टर साहब? पता नहीं आपको किस बात का डर सता रहा है कि आपकी सरकार बार-बार कोर्ट जाकर जांच रुकवाती रही।” बघेल ने तर्क दिया कि जब भी उनकी सरकार ने इस मामले की तह तक जाने के लिए नई जांच कमेटी बनाने या एनआईए (NIA) से फाइलें वापस लेने की कोशिश की, तो उसे कानूनी अड़चनों में उलझा दिया गया।
भूपेश बघेल ने अपनी बात को और कड़ा करते हुए कहा कि यदि इस मामले की निष्पक्ष तरीके से जांच करवाई जाए, तो वे आज भी सारे सबूत पेश करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि सच सामने आने से रोकने के लिए अदालती कार्यवाही का सहारा लेना बंद करना चाहिए। बघेल ने चेतावनी भरे लहजे में यह भी जोड़ा, “सोच लीजिए, कहीं बाद में पछताना न पड़े।” इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या वाकई कांग्रेस के पास ऐसे कोई तकनीकी या रणनीतिक सबूत हैं जो आने वाले समय में भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।
बता दें कि 25 मई 2013 को बस्तर की झीरम घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ पर घात लगाकर हमला किया था। इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, दिग्गज नेता विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र कर्मा सहित 30 से अधिक लोग मारे गए थे। इस घटना ने छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। तब से लेकर आज तक, इस हत्याकांड की जांच एनआईए और विभिन्न न्यायिक आयोगों द्वारा की गई है, लेकिन इसकी ‘साजिश’ (Conspiracy) वाला हिस्सा आज भी विवादों और राजनीति के घेरे में है।
छत्तीसगढ़ की जनता के लिए झीरम घाटी केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहरी संवेदना है। जहाँ भाजपा इसे कांग्रेस की विफलता और झूठे वादे के तौर पर पेश कर रही है, वहीं कांग्रेस इसे भाजपा की कथित ‘साजिश’ और जांच में बाधा डालने का मामला बता रही है। दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों के बीच की यह ताजा भिड़ंत यह स्पष्ट करती है कि आगामी दिनों में नक्सलवाद और झीरम का मुद्दा राज्य की चुनावी और सामाजिक फिजां में छाया रहेगा। अंततः सवाल यही है कि क्या इस जघन्य हत्याकांड के पीड़ितों को कभी वह ‘पूर्ण न्याय’ मिल पाएगा जिसका वादा हर राजनीतिक दल करता आ रहा है।
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