Justice Verma case : नकदी घोटाले में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम टिप्पणी की। जब याचिकाकर्ता वकील मैथ्यूज नेदुम्बरा ने सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति वर्मा को केवल ‘वर्मा’ कहकर संबोधित किया, तो मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने नाराज़गी जताते हुए कहा, “क्या जस्टिस वर्मा आपके मित्र हैं? यह मत भूलिए कि वह अब भी एक जज हैं और उस सम्मान के हकदार हैं।”
वकील मैथ्यूज नेदुम्बरा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिसमें उन्होंने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। उनकी याचिका में कहा गया था कि निचली अदालत या पुलिस प्रशासन को निर्देश दिया जाए कि वे वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार और नकदी बरामदगी के मामले में आपराधिक मुकदमा दर्ज करें।
सुनवाई के दौरान जब वकील ने बार-बार जस्टिस वर्मा को ‘वर्मा’ कहकर पुकारा, तो मुख्य न्यायाधीश गवई ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “क्या आप चाहते हैं कि मैं आपकी याचिका तुरंत खारिज कर दूं? आप उन्हें इस तरह कैसे संबोधित कर सकते हैं? वह अभी तक उच्च न्यायपालिका का हिस्सा हैं और उनके लिए सम्मानजनक भाषा का प्रयोग अनिवार्य है।”
सूत्रों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस कमेटी ने अपनी जांच में जस्टिस वर्मा के खिलाफ गंभीर सबूत पाए हैं। समिति ने इस आधार पर उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश भी की है। केंद्र सरकार इस रिपोर्ट को आधार बनाकर उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है और इसके लिए विपक्षी दलों से भी संपर्क साधा जा रहा है, ताकि महाभियोग प्रस्ताव को संसद में समर्थन मिल सके।
हालांकि, न्यायमूर्ति वर्मा को हटाए जाने की प्रक्रिया अभी पूर्ण नहीं हुई है। वे अब भी अपने पद पर बने हुए हैं और इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि जब तक वे आधिकारिक रूप से बर्खास्त नहीं हो जाते, उन्हें ‘जज’ के तौर पर संबोधित करना आवश्यक है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी संस्थागत गरिमा बनाए रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने खुद को हटाने की सिफारिश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। इस याचिका में उन्होंने निष्कासन प्रक्रिया को रोकने की मांग की है। ऐसे में कानूनी प्रक्रिया अभी भी जारी है और अंतिम निर्णय आने तक वे अपने पद पर बने रहेंगे।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकील और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी वकील नेदुम्बरा के व्यवहार पर असहमति जताई। उन्होंने कहा कि अदालत की गरिमा का पालन हर पेशेवर का कर्तव्य है। न्यायाधीशों के प्रति सम्मान बनाए रखना न केवल परंपरा है, बल्कि संवैधानिक मूल्य भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अदालत की गरिमा और न्यायाधीशों का सम्मान किसी भी परिस्थिति में कम नहीं किया जा सकता, चाहे वे किसी मामले में आरोपी ही क्यों न हों। यह घटनाक्रम न्यायिक प्रणाली की मर्यादा बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है और साथ ही यह भी दर्शाता है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक किसी भी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
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