Kawardha News
Kawardha News: छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले से दिल दहला देने वाली एक घटना सामने आई है, जहां चरित्र पर संदेह के चलते एक पति ने अपनी पत्नी को जिंदा जला दिया। इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी पति की सजा के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मरते समय दिया गया बयान (Dying Declaration) न्याय की दृष्टि में सर्वोपरि है।
यह दर्दनाक घटना कबीरधाम जिले के पांडातराई थाना क्षेत्र की है। आरोपी संतोष उर्फ गोलू श्रीवास्तव अपनी पत्नी लता श्रीवास्तव के चरित्र पर अक्सर संदेह करता था। इसी शक की वजह से घर में आए दिन कलह और विवाद की स्थिति बनी रहती थी। 18 नवंबर 2019 को यह विवाद इतना बढ़ गया कि संतोष ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। उसने आवेश में आकर घर का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया ताकि उसकी पत्नी मदद के लिए बाहर न भाग सके और न ही कोई अंदर आ पाए।
बंद कमरे के भीतर आरोपी ने अपनी पत्नी पर मिट्टी का तेल (केरोसिन) उड़ेल दिया और माचिस जलाकर उसे आग के हवाले कर दिया। देखते ही देखते लता आग की लपटों में घिर गई। जब वह तड़प रही थी, तब भी आरोपी का दिल नहीं पसीजा और वह उसे जलते हुए देखता रहा। आग की जलन से बचने के लिए तड़पती हुई लता किसी तरह घर से बाहर निकली और पास ही स्थित एक तालाब में कूद गई। उसने अपनी जान बचाने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन वह तब तक काफी हद तक झुलस चुकी थी।
गंभीर रूप से झुलसी हुई लता को तत्काल जिला अस्पताल ले जाया गया। वहां उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए कार्यपालिक मजिस्ट्रेट को बुलाया गया। अपनी अंतिम सांसें गिन रही लता ने हिम्मत दिखाते हुए मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराया। उसने स्पष्ट रूप से बताया कि उसके पति संतोष ने ही उस पर मिट्टी तेल डालकर आग लगाई है। यह बयान इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज साबित हुआ। करीब 21 दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच जूझने के बाद, 9 दिसंबर 2019 को ‘सेप्टिक शॉक’ की वजह से उसकी मृत्यु हो गई।
निचली अदालत ने संतोष को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने इस अपील पर सुनवाई की। अदालत ने ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा कि मृत्यु पूर्व दिया गया बयान (Dying Declaration) अपने आप में दोषसिद्धि का सबसे ठोस आधार है। बेंच ने कहा, “यह माना जाता है कि मरते हुए व्यक्ति के होठों पर सत्य निवास करता है, क्योंकि वह अपने ईश्वर से मिलने से पहले झूठ नहीं बोलेगा।”
डिवीजन बेंच ने मामले के सभी साक्ष्यों और मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए बयान का बारीकी से अध्ययन किया। अदालत ने पाया कि आरोपी ने योजनाबद्ध तरीके से दरवाजा बंद कर अपनी पत्नी की हत्या का प्रयास किया था। हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को सही ठहराते हुए संतोष की अपील को सिरे से खारिज कर दिया। इस फैसले ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि घरेलू हिंसा और जघन्य अपराधों में संलिप्त अपराधियों के लिए कानून में कोई सहानुभूति नहीं है।
यह घटना न केवल एक परिवार के उजड़ने की कहानी है, बल्कि समाज में बढ़ते अविश्वास और हिंसक प्रवृत्तियों को भी दर्शाती है। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख से उम्मीद है कि समाज में इस तरह के जघन्य कृत्य करने वालों के मन में कानून का डर बैठेगा। पुलिस और न्यायपालिका के आपसी समन्वय से मिले इस फैसले ने मृतका को मरणोपरांत न्याय प्रदान किया है।
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