Kalyan Banerjee Controversial Statement: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य की सियासत में जुबानी जंग अपने चरम पर पहुँच गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता और श्रीरामपुर से सांसद कल्याण बनर्जी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक अत्यंत विवादित और आपत्तिजनक टिप्पणी की है। कोलकाता में आयोजित एक विरोध रैली के दौरान बनर्जी ने अपना आपा खोते हुए कहा कि अगर ज्ञानेश कुमार मुख्य निर्वाचन आयुक्त के संवैधानिक पद पर आसीन नहीं होते, तो वह उनकी उंगली काट देते। यह बयान उस समय आया है जब टीएमसी राज्य में मतदाता सूची से लाखों नाम हटाए जाने को लेकर चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है।
विवाद की जड़: दिल्ली में ममता बनर्जी और CEC के बीच कथित टकराव
कल्याण बनर्जी के इस गुस्से के पीछे पिछले महीने दिल्ली में हुई एक घटना है। दरअसल, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए दिल्ली में CEC ज्ञानेश कुमार से मिलने गई थीं। कल्याण बनर्जी का आरोप है कि उस मुलाकात के दौरान चुनाव आयोग के प्रमुख ने मुख्यमंत्री के साथ ‘अशोभनीय’ व्यवहार किया। उन्होंने दावा किया कि बातचीत के दौरान CEC ने ममता बनर्जी पर उंगली उठाई थी, जिसे टीएमसी ने मुख्यमंत्री के अपमान के रूप में लिया है। बनर्जी ने रैली में गरजते हुए कहा, “सीईसी ने उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया। उन्होंने मुख्यमंत्री पर उंगली उठाने की हिम्मत कैसे की? अगर वह उस पद पर न होते, तो मैं उसी दिन उनकी उंगली काट देता।”
बीजेपी का पलटवार: ‘लोकतंत्र और संस्थाओं का अपमान कर रही टीएमसी’
सांसद कल्याण बनर्जी के इस हिंसक बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने टीएमसी को आड़े हाथों लिया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने इस टिप्पणी की कड़ी निंदा करते हुए इसे तृणमूल कांग्रेस की ‘असली मानसिकता’ बताया। बीजेपी नेताओं का कहना है कि टीएमसी को न तो लोकतंत्र पर भरोसा है और न ही वह संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करती है। बीजेपी ने चुनाव आयोग से इस मामले में संज्ञान लेने और संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को धमकी देने के आरोप में उचित कार्रवाई करने की मांग की है।
SIR प्रक्रिया और वोटरों का गणित: क्यों मचा है बवाल?
विवाद का असली कारण चुनाव आयोग द्वारा किया गया ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) है। 28 फरवरी को जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस प्रक्रिया के बाद पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में बड़े बदलाव आए हैं। पिछले साल नवंबर से शुरू हुई इस प्रक्रिया में लगभग 63.66 लाख नाम हटा दिए गए हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 8.3 प्रतिशत है। इसके कारण राज्य में मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ के करीब रह गई है। टीएमसी का दावा है कि ये नाम मनमाने तरीके से हटाए गए हैं और लाखों मामले अब भी लंबित हैं, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
निष्कर्ष: चुनाव से पहले बंगाल में बढ़ती कड़वाहट
कल्याण बनर्जी के बयान ने बंगाल के राजनीतिक माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है। एक ओर जहाँ टीएमसी इसे जनता के अधिकारों की लड़ाई बता रही है, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग और विपक्षी दल इसे एक संवैधानिक संस्था को डराने-धमकाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची का यह विवाद और कल्याण बनर्जी जैसे नेताओं की बयानबाजी राज्य में एक बड़े राजनीतिक और कानूनी संघर्ष की ओर इशारा कर रही है।
















