Kangana Ranaut: बॉलीवुड अभिनेत्री और बीजेपी सांसद कंगना रनौत को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। किसान आंदोलन के दौरान किसानों पर की गई विवादित टिप्पणी को लेकर दर्ज मानहानि के मामले में कंगना रनौत की राहत की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी वह याचिका खारिज कर दी है जिसमें उन्होंने मानहानि केस को रद्द करने की मांग की थी।
यह मामला वर्ष 2020-21 के किसान आंदोलन से जुड़ा है, जब देशभर में किसान कृषि कानूनों के विरोध में सड़कों पर थे। इसी दौरान कंगना रनौत ने एक विवादास्पद टिप्पणी की थी, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर खूब बवाल मचा था। इस टिप्पणी को लेकर देश के कई हिस्सों में उनके खिलाफ आपत्तियां दर्ज कराई गईं। इसके बाद उनके खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज किया गया।
कंगना रनौत की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह मामला ट्रायल का विषय है। अदालत ने कहा कि सिर्फ यह कह देना कि यह एक री-ट्वीट था, पर्याप्त नहीं है। क्योंकि कंगना रनौत ने अपने शब्दों में टिप्पणी की थी, जो कि जांच का विषय है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, “आप निचली अदालत में अपना पक्ष रखें। अगर वहां से मामला हमारे पास आता है, तो हम देखेंगे।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर केस रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।
कंगना के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलील दी कि एक्ट्रेस ने केवल एक ट्वीट को रि-ट्वीट किया था, जो पहले से ही सोशल मीडिया पर था और कई अन्य लोगों द्वारा भी शेयर किया गया था। वकील का कहना था कि यह मामला कंगना को अनावश्यक रूप से घसीटने की कोशिश है।
हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को मानने से इनकार कर दिया और कहा कि रि-ट्वीट के साथ कंगना की खुद की टिप्पणी भी थी, इसलिए मामला गंभीर है और इसका फैसला ट्रायल कोर्ट में ही होगा।
अब इस मामले की सुनवाई निचली अदालत में जारी रहेगी। कंगना रनौत को अपने बचाव में वहां उपस्थित होकर दलीलें पेश करनी होंगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह तय हो गया है कि मामला जल्द खत्म होने वाला नहीं है और कंगना को कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ेगा।
कंगना रनौत को सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने से यह साफ हो गया है कि सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों को भी गंभीरता से लिया जा सकता है, खासकर जब वे किसी संवेदनशील मुद्दे से जुड़ी हों। यह मामला न केवल कंगना के लिए बल्कि सोशल मीडिया पर सक्रिय तमाम लोगों के लिए एक बड़ा संदेश है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कानून का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
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