Karnataka Political : कर्नाटक के कडाबा नगर पंचायत चुनाव में एक चौकाने वाली घटना सामने आई है, जिसने राजनीति के खेल और वोट की अहमियत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वार्ड नंबर एक (कलारा), जो महिलाओं के लिए आरक्षित है, में भाजपा की उम्मीदवार प्रेमा को एक भी वोट नहीं मिला। यह वार्ड भाजपा का दावा करने वाले दक्षिणी कर्नाटक के तटीय क्षेत्र में स्थित है, लेकिन इस बार स्थानीय चुनावों के नतीजों ने सभी को चौंका दिया।
वार्ड नंबर एक में कुल 418 वोट पड़े, जिनमें से भाजपा को एक भी वोट नहीं मिला। इस वार्ड से कांग्रेस की थमन्ना जबीन विजेता रही, जिन्होंने 201 वोट हासिल किए। निर्दलीय उम्मीदवार जैनबी आदम को 74 और एसडीपीआई के उम्मीदवार को 62 वोट मिले। वहीं, भाजपा की प्रेमा, जो खुद उस वार्ड की मतदाता नहीं थीं बल्कि वार्ड नंबर छह की निवासी हैं, को शून्य वोट मिलने की खबर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी।
भाजपा की स्थानीय इकाई ने मुस्लिम बहुल क्षेत्र को हार का कारण बताया है। दक्षिण कन्नड़ भाजपा अध्यक्ष सतीश कुमप्पा ने बताया कि नामांकन के बाद स्थानीय मंडल इकाई ने निर्दलीय उम्मीदवार जैनबी आदम का समर्थन किया, क्योंकि उन्हें उस वार्ड में पार्टी की जीत की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने कहा, “हमने अपनी हार को लेकर पहले से ही योजना बना ली थी और इसलिए दूसरे उम्मीदवार को समर्थन दिया।”
यहां तक कि कांग्रेस ने इस घटना का राजनीतिक लाभ उठाते हुए दावा किया कि भाजपा की उम्मीदवार प्रेमा के बूथ अध्यक्ष और उनके दो प्रस्तावकों ने भी उन्हें वोट नहीं दिया। जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के. हरीश कुमार के अनुसार, अगर बूथ अध्यक्ष और प्रस्तावक प्रेमा को वोट देते तो उन्हें कम से कम तीन वोट तो मिलते।
यह पहला चुनाव था जब ग्राम पंचायत से नगर पंचायत में रूपांतरण हुआ था। इस चुनाव में कांग्रेस ने कुल 13 सीटों में से 8 पर कब्जा जमाया, जबकि भाजपा केवल 5 सीट जीत सकी। यह परिणाम भाजपा के लिए चिंता का विषय है, खासकर तब जब पार्टी के ही कुछ सदस्य अपने उम्मीदवार के खिलाफ वोट डालते दिखे।
कडाबा वार्ड नंबर एक का यह मामला दर्शाता है कि राजनीति में सिर्फ पार्टी के समर्थन से जीत नहीं होती, बल्कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेता वर्ग की एकजुटता भी बेहद जरूरी है। भाजपा के अपने बूथ अध्यक्ष और प्रस्तावकों द्वारा उम्मीदवार को वोट न देना पार्टी की अंदरूनी कमजोरियों को उजागर करता है।
यह घटना कर्नाटक की राजनीति में पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल और संगठनात्मक ढांचे पर भी सवाल उठाती है। आगामी चुनावों में भाजपा के लिए यह चुनौती होगी कि वह अपने कार्यकर्ताओं का विश्वास और समर्थन बनाए रखे ताकि ऐसी शर्मनाक स्थिति दोबारा न पैदा हो।
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