Karnataka CM
Karnataka CM: कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच सत्ता को लेकर चल रहा शीत युद्ध एक बार फिर गहरा गया है। जिस दिन सिद्धारमैया ने सीएम पद की शपथ ली थी, तभी से दोनों नेताओं के समर्थक खुलेआम यह दावा करते रहे हैं कि सत्ता का बंटवारा ‘ढाई-ढाई साल’ के फॉर्मूले पर हुआ है, जिसके तहत पहले ढाई साल सिद्धारमैया और उसके बाद डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनेंगे। हालांकि, सिद्धारमैया हमेशा इस तरह के किसी भी समझौते से इनकार करते रहे हैं।
अब जबकि कथित ‘ढाई साल’ की समय-सीमा पूरी हो चुकी है, डीके शिवकुमार ने स्पष्ट रूप से मुख्यमंत्री पद की मांग उठा दी है, और सिद्धारमैया ने अपनी कुर्सी छोड़ने से मना कर दिया है। पिछले दिनों दोनों नेताओं के बीच तनाव कम करने के लिए “ब्रेकफास्ट डिप्लोमेसी” भी चली थी, और ऐसा लगा था कि शायद कोई अंदरूनी हल निकल गया है, लेकिन ताजा घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि मामला सुलझा नहीं है, बल्कि और उलझ गया है।
कर्नाटक के इस ज्वलंत मुद्दे को सुलझाने के लिए आज कांग्रेस आलाकमान ने एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई। यह हाई-प्रोफाइल बैठक शाम 5 बजे सोनिया गांधी के आवास पर शुरू हुई। इस बैठक में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल मौजूद थे।
सूत्रों के अनुसार, इन प्रमुख नेताओं ने लगभग दो घंटे तक कर्नाटक के राजनीतिक समीकरणों पर गहन विचार-विमर्श किया। बैठक का मुख्य फोकस मुख्यमंत्री पद में बदलाव के फायदे और संभावित नुकसान पर चर्चा करना था। आलाकमान ने डीके शिवकुमार को सीएम बनाने और सिद्धारमैया को बनाए रखने, दोनों स्थितियों में पार्टी पर पड़ने वाले राजनीतिक प्रभाव का आकलन किया। लेकिन, दो घंटे के लंबे ‘मंथन’ के बाद भी, इस जटिल मुद्दे पर कोई ठोस या अंतिम नतीजा नहीं निकला। यह दिखाता है कि कांग्रेस नेतृत्व के लिए यह फैसला लेना कितना मुश्किल साबित हो रहा है।
बैठक के बाद, कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने मीडिया को जानकारी दी कि आलाकमान और दोनों कर्नाटक नेताओं के बीच जल्द ही एक और मुलाकात हो सकती है। सूत्रों के मुताबिक, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार अगले सप्ताह दिल्ली आएंगे। उनकी यह यात्रा मुख्य रूप से 14 दिसंबर को होने वाली एक महत्वपूर्ण पार्टी रैली से संबंधित है।
वेणुगोपाल ने बताया कि इस बैठक में 14 दिसंबर की रैली की तैयारियों पर भी बातचीत हुई। उन्होंने दावा किया कि “कर्नाटक में पार्टी पूरी तरह एकजुट है” और इस मुद्दे को लेकर आगे भी बैठकें होंगी। यह बयान दर्शाता है कि पार्टी फिलहाल आंतरिक कलह की खबरों को दबाने की कोशिश कर रही है और एकजुटता दिखाने पर जोर दे रही है। हालांकि, पर्दे के पीछे सीएम पद की मांग का दबाव बरकरार है।
कर्नाटक का यह सीएम पद विवाद कांग्रेस के लिए एक पुरानी और खतरनाक ‘उलझन’ बन गया है। पार्टी नेतृत्व को डर है कि वह कर्नाटक में वही गलती दोहरा सकती है जो उसने पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश में की थी। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट, तथा मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच चल रहे सत्ता संघर्ष को कांग्रेस आलाकमान समय रहते सुलझा नहीं पाया था।
इसका नतीजा यह हुआ कि दोनों राज्यों में पार्टी को बाद में विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। मध्य प्रदेश में तो ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था, जिससे कांग्रेस सरकार गिर गई थी। कांग्रेस नेतृत्व कर्नाटक में इस स्थिति से बचना चाहता है, क्योंकि यह दक्षिण भारत में उसकी एकमात्र बड़ी सरकार है। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि मुख्यमंत्री का पद एक है, और सिद्धारमैया तथा डीके शिवकुमार, दोनों ही इससे कम पर समझौता करने को तैयार नहीं दिख रहे हैं, जिसने आलाकमान को धर्मसंकट में डाल दिया है।
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