Karnataka High Court Verdict: कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसले में कलबुर्गी जिले के आलन्द टाउन स्थित लाडले मशाइक दरगाह के भीतर मौजूद ‘राघव चैतन्य शिवलिंग’ की पूजा करने की अनुमति दे दी है। आगामी 15 फरवरी को महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर हिंदू पक्ष को दरगाह परिसर में प्रवेश कर धार्मिक अनुष्ठान करने का अधिकार मिला है। कोर्ट के इस निर्णय से हिंदू समुदाय और याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत मिली है। सिद्ध रामैया हीरेमठ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि शांति व्यवस्था बनाए रखते हुए सीमित संख्या में लोग इस पूजा का हिस्सा बन सकेंगे।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: ‘हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का सम्मान जरूरी’
हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ दरगाह कमेटी ने आज सुबह ही देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। दरगाह कमेटी की दलील थी कि किसी भी धार्मिक स्थल का चरित्र बदलने की कोशिश की जा रही है और पूजा की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि, चीफ जस्टिस (CJI) की अगुवाई वाली बेंच ने इस विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि हर मामला सीधे शीर्ष अदालत में आने लगा, तो इससे यह संदेश जाएगा कि हाई कोर्ट की कोई महत्ता नहीं रह गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को पहले हाई कोर्ट के आदेश का सम्मान करना चाहिए।
धार्मिक स्थलों के चरित्र बदलने का विवाद और दरगाह कमेटी की दलील
दरगाह कमेटी ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि अंतरिम अदालती आदेशों के माध्यम से किसी धार्मिक स्थल की प्रकृति और उसके चरित्र को बदलने का एक ‘कोऑर्डिनेटेड पैटर्न’ यानी सुनियोजित तरीका अपनाया जा रहा है। मुस्लिम पक्ष का तर्क था कि यह स्थल सदियों से एक दरगाह रहा है और वहां हिंदू रीति-रिवाजों की अनुमति देना भविष्य में विवाद को जन्म दे सकता है। हालांकि, कोर्ट ने तथ्यों और ऐतिहासिक साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए पूजा के अधिकार को बरकरार रखा है।
14वीं और 15वीं सदी का साझा इतिहास: क्यों विवादों में है यह स्थल?
आलन्द की यह दरगाह सांप्रदायिक सद्भाव और साझा विरासत का प्रतीक रही है। यह स्थल 14वीं सदी के प्रसिद्ध सूफी संत हज़रत शेख अलाउद्दीन अंसारी (लाडले मशाइक) और 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य की स्मृतियों से जुड़ा है। परिसर के भीतर ही दोनों संतों के अवशेष मौजूद हैं और वहां एक शिवलिंग नुमा ढांचा भी स्थापित है जिसे राघव चैतन्य शिवलिंग कहा जाता है। ऐतिहासिक रूप से यहां दोनों समुदायों के लोग अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार इबादत और पूजा करते आए हैं, लेकिन हाल के वर्षों में यह स्थल कानूनी विवाद का केंद्र बन गया है।
2022 की घटना और बढ़ता सांप्रदायिक तनाव
इस साझा विरासत वाले स्थल पर विवाद की जड़ें साल 2022 में गहरी हुईं। उस दौरान कुछ उपद्रवी तत्वों द्वारा शिवलिंग पर कथित तौर पर गंदगी फेंकने की घटना सामने आई थी, जिसके बाद इलाके में भारी सांप्रदायिक तनाव फैल गया था। इसी घटना के बाद से हिंदू पक्ष ने शिवलिंग की सुरक्षा और वहां नियमित रूप से विशेष अवसरों पर पूजा करने की कानूनी मांग तेज कर दी। प्रशासन के लिए इस संवेदनशील इलाके में शांति बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया था।
पिछली परंपरा और सुरक्षा के कड़े इंतजाम
फरवरी 2025 में भी कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसी तरह का आदेश दिया था, जिसमें हिंदू समुदाय के 15 सदस्यों को कड़ी सुरक्षा के बीच महाशिवरात्रि पूजा करने की इजाजत दी गई थी। पिछले साल का अनुभव सफल रहा था और बिना किसी अप्रिय घटना के अनुष्ठान संपन्न हुआ था। इसी नजीर को ध्यान में रखते हुए, 2026 में भी अदालत ने सीमित संख्या में भक्तों को प्रवेश की अनुमति दी है। प्रशासन ने 15 फरवरी के लिए कलबुर्गी में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने और ड्रोन से निगरानी रखने के निर्देश दिए हैं ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे।
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