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ख़बर तड़का :

भाजपाईयों का डर-एक तो पहले से कोदो दर रहा अब दूसरा भी दरेगा

सरगुजा भाजपा में विचित्र स्थिति हो गई है। विधानसभा का टिकट दूसरे दल से आने वाले को दे दिया। इत्तेफाक देखिए कि वह चुनाव जीत भी गए। भले ही जीत का अंतर बहुत कम है पर जीत तो गए..! इतिहास तो रच दिया.. इतिहास में नाम तो दर्ज कर लिया कई पीढियां के लिए..! चर्चा का विषय भी रहेगा कि राजा को किसने हराया..? ऐसे में भाजपा संगठन के नेता अपने आप को हासिए पर मान रहे हैं। विधानसभा चुनाव किसी और ने जीता तो खुशी भी नहीं मना पाए। अब भाजपा ने कांग्रेस से आए व्यक्ति को लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बना दिया है, ऐसी स्थिति में ‘घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का’ सिद्ध कहावत चरितार्थ हो रही है। जो लोग भाजपा को अपनी बपौती समझते थे उन्हें बाहरी लोगों को जीताना पड़ रहा है, उनके लिए काम करना पड़ रहा है। ऐसे में विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में भी भाजपा संगठन के नेताओं के लिए वही स्थिति निर्मित हो गई है। एक नेता ने तो कहा- बाहर से आया व्यक्ति अंबिकापुर में विधायक बन गया, पहले से कोदो दर रहा है और अब दूसरा भी आ गया, इसे भी जीता दिए तो यह भी कोदो दरेगा…
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यहां प्रचार करने से डर रहे कांग्रेसी, कहीं जेब का पैसा न लग जाए

सरगुजा लोकसभा क्षेत्र में आठ विधानसभा क्षेत्र आते हैं। बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ से सभी सीटें खिसक गई। अब लोकसभा चुनाव का दौरा आ गया। प्रचार भी अंतिम चरण पर है। किसी भी विधानसभा क्षेत्र में विधायक नहीं है पर पांच साल पैसा कमाए पदाधिकारी जरूर हैं। कुछ पूर्व मंत्री भी है, जिन्होंने जमकर धन बटोरा है, ऐसे लोग कांग्रेस प्रत्याशी के चुनाव प्रचार से इसलिए मुंह छुपाए चल रहे हैं ताकि उन्हें जेब से पैसा न लगाना पड़ जाए। कांग्रेस संगठन का हाथ खाली है। पैसा लगाने वाला शहर से बाहर है, ऐसे में पैसा लगाए कौन..? अपने आप को बड़ा नेता बताने वाले जेब ढीली करने से डर रहे, इसलिए चुनाव प्रचार करने से परहेज कर रहे हैं। जेब ढीली करने का यह डर कांग्रेस को फिर झटका न दे दे..! यह जरूर है कि कुछ ने अपनी जेब ढीली करने की हिम्मत भी दिखाई है पर लोकसभा क्षेत्र बहुत बड़ा है, एक अकेला अपनी जेब नहीं कटवा सकता..!
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माननीयों की चिंता ..

चुनाव जीतकर माननीय पहुंच गए विधानसभा। संसदीय सीट में इनकी संख्या है आठ। प्रचंड गर्मी में माननीयों की चिंता बढ़ गई है। बोला गया है कि आपने तो चुनाव जीत लिया है। बस इसी से संतुष्ट नहीं रहना है। जितने वोट से आपने जीता है वह आंकड़ा इस चुनाव में भी कम नहीं होना चाहिए। अब माननीय परेशान हैं। कहते हैं कि वे तो विरोधी थे। अभी-अभी आए हैं। कल तक जिनका विरोध कर रहे थे अब उनके लिए वोट तो मांग रहे हैं, मतदाताओं की मर्जी है जिसे चाहेंगे देंगे। अब अच्छा उपाय ढूंढ लिया है। सोशल मीडिया में हर रोज फ़ोटो, वीडियो अपलोड करवा रहे हैं। परिणाम जो भी रहे लेकिन यह तो बता सकेंगे देखिए भाई साहब.. हमने कितनी मेहनत की थी। एक बार तो मेरा मोबाइल देख लीजिए..!
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जुर्माना तो ठीक लेकिन जागरूकता कैसे ?
इन दिनों सरगुजा पुलिस टाइट है। वाहन चेकिंग में तो ऐसी सख्ती है कि अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जा रही है। प्रतिदिन चेकिंग में वाहनें फंस रही हैं। चालक जुर्माना दे रहे हैं और आगे बढ़ रहे है। इनकी संख्या में कमी नहीं आ रही है, दुर्घटनाओं का आंकड़ा भी कम नहीं हो रहा है। अब मांग उठ रही है कि कप्तान साहब एक बार इस बात की भी समीक्षा करवा लें कि इतना भारी भरकम जुर्माना वसूलने के बाद दुर्घटनाओं में कमी आई या नहीं। वैसे शहर के प्रमुख मार्गों में नियम तोड़ने वालों की संख्या में तो कमी नहीं आई है।
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ये सब पावरफुल हैं साहब …

सरगुजा जिले में 10 वीं और 12 वीं के विद्यार्थियों के लिए इस बार विशेष पहल हुई। ग्रीष्मावकाश में बच्चों को पढ़ाई की सुविधा दी जा रही है लेकिन इस व्यवस्था को शहर के नजदीक के स्कूलों के कुछ प्राचार्य और शिक्षक फेल करने में लगे हैं। पिछले दिनों बड़े साहब शहर के नजदीक एक स्कूल में पहुंच गए। बच्चों के हित में चलाई जा रही योजना को लेकर न तो प्राचार्य की ओर से रुचि दिखी और न ही शिक्षक-शिक्षिकाओं की ओर से। साहब नाराज हुए। स्कूल से रवाना होते ही विभागीय अधिकारियों को निर्देशित किया कि उस स्कूल को योजना से हटा दीजिए। अब साहब को यह बताने की हिम्मत कौन करे कि- साहब शहर के आसपास के स्कूलों में सब पावरफुल हैं। पहुंच और प्रभाव ऐसा की किसी की कोई परवाह ही नहीं है। अपने बच्चों के भविष्य को लेकर तो ये सब चिंतित रहते हैं लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य को लेकर ये बेफिक्र हैं। इनकी बेफिक्री दूर करने का एक ही उपाय है। या तो नकेल कसी जाए या फिर शहर के दूर स्कूलों में इन्हें भेजा जाए।
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महतारी पर महालक्ष्मी कहीं भारी न पड़ जाए

सरगुजा लोकसभा क्षेत्र में भाजपा के महतारी वंदन योजना की तर्ज पर कांग्रेस ने महालक्ष्मी न्याय योजना का फार्म तेजी से भरवाना शुरू कर दिया है। इसका व्यापक प्रभाव भी देखने को मिल रहा है। शहर से लेकर गांव तक महिलाएं इस फार्म को भर रहीं हैं। इसके पीछे कारण यह है कि इस योजना के तहत कांग्रेस ने सालाना एक लाख दिए जाने की घोषणा की है। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ा दांव खेला था और महतारी वंदन योजना लाकर महिलाओं से फार्म भरवाया और चुनाव भी जीत गए। इस योजना का असर चुनाव में रहा। महिलाओं का रुझान भाजपा की ओर दिखा और सरकार बनते ही भाजपा ने फार्म भरने वाली महिलाओं को 1000 रुपये महीना देना शुरू कर दिया। इससे भरोसा भी बढ़ा है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इसी तर्ज पर महालक्ष्मी न्याय योजना लाकर महिला मतदाताओं को अपनी ओर खींचा है। कांग्रेस का लक्ष्य है लोकसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में फार्म भरवाने का। इसके लिए कार्यकर्ता भी लग गए हैं। देखना है, भाजपा की महतारी वंदन योजना पर कांग्रेस की महालक्ष्मी न्याय योजना कितना भारी पड़ती है। कांग्रेस के लिए यह फायदेमंद साबित हो न हो भाजपा के कान जरूर खड़े हो गए हैं, क्योंकि भाजपाई जहां जा रहे हैं वहां महालक्ष्मी न्याय योजना की चर्चा तो शुरू हो ही गई है।
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फंड मैनेजरों की बंद मुट्ठी से चुनावी रौनक घटी

मई माह के पहले सप्ताह में सरगुजा संसदीय सीट के लिए मतदान होना है। मतदान का दिन मंगलवार होने के कारण अंबिकापुर में व्यापारी वर्ग से होने वाले मतदान का प्रतिशत बढ़ सकता है। कलेक्टर के साथ प्रशासनिक अमला भी डोर टू डोर कैंपेन चलाकर मतदान बढ़ाने के अभियान में संजीदगी से लगा है। पिछले विधानसभा चुनाव का परिणाम तय करने में अंबिकापुर शहर की ही निर्णायक भूमिका रही है। भारतीय जनता पार्टी व्यापारी साथियों को अपना परंपरागत वोट बैंक मानती है, इस समुदाय को साधने के लिए अलग-अलग वर्ग के व्यापारियों का सम्मेलन किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर जीएसटी की पेचीदा प्रक्रिया, सेंट्रल व स्टेट जीएसटी के छापे और इससे उपजे नाराजगी को कांग्रेस भुनाने में जी जान से लगी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 77.2 प्रतिशत मतदान के आंकड़े को पार करना बड़ी चुनौती है। यथास्थितिवाद व स्वप्नहीनता जनमन पर हावी है, ऐसे में मतदान बढ़ाने में राजनीतिक दलों का प्रयास नाकाफी ही दिखता है। तीसरे चरण के मतदान के कारण, अतिरिक्त समय मिलने के बावजूद बड़े कसबों, बाज़ारों, गांव के चौक चौराहों तक चुनावी माहौल पहुंच पाने में फंड मैनेजरों की बंद मुट्ठी और भीषण गर्मी से राजनीतिक दल कामयाब नहीं हो पा रहे हैं।
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