Khawaja Asif
Khawaja Asif: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने नेशनल असेंबली में एक ऐसा बयान दिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में सनसनी फैला दी है। अमेरिका और पाकिस्तान के दशकों पुराने संबंधों पर चर्चा करते हुए आसिफ ने वाशिंगटन पर बेहद गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने हमेशा पाकिस्तान को एक रणनीतिक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया है। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने ‘यूज एंड थ्रो’ की नीति का जिक्र करते हुए ‘टॉयलेट पेपर’ जैसे विवादित शब्द का उपयोग किया। आसिफ का मानना है कि अमेरिका ने अपने स्वार्थ सिद्ध होने के बाद हर बार पाकिस्तान को मझधार में छोड़ दिया, जिससे देश को अपूरणीय क्षति हुई है।
इतिहास के पन्नों को पलटते हुए रक्षा मंत्री ने 1980 के दशक का जिक्र किया, जब सोवियत संघ (रूस) ने अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया था। आसिफ ने दावा किया कि उस दौर में रूस के खिलाफ शुरू हुआ विद्रोह वास्तव में कोई ‘जिहाद’ नहीं, बल्कि अमेरिका के इशारे पर लड़ा गया एक प्रायोजित युद्ध था। उन्होंने तत्कालीन सैन्य तानाशाह जनरल जियाउल हक की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि निजी हितों और सत्ता को बचाए रखने के लिए पाकिस्तान को एक ऐसी जंग में झोंक दिया गया, जिससे हमारा कोई लेना-देना नहीं था। इस फैसले ने पाकिस्तान के सामाजिक ताने-बाने में कट्टरपंथ का बीज बो दिया।
ख्वाजा आसिफ ने साल 2001 को पाकिस्तान के इतिहास का दूसरा सबसे काला अध्याय बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका के दबाव में आकर पाकिस्तान ने अपने ही द्वारा समर्थित तालिबान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। जनरल परवेज मुशर्रफ के फैसलों पर हमला बोलते हुए आसिफ ने कहा कि हमने अमेरिका को अपना हवाई क्षेत्र (Airspace) दिया, कराची बंदरगाह के इस्तेमाल की अनुमति दी और अपने संसाधनों को उनके हवाले कर दिया। आज स्थिति यह है कि अमेरिका अफगानिस्तान से सुरक्षित निकल चुका है, लेकिन पाकिस्तान आज भी उस युद्ध की आग में जल रहा है और आतंकवाद का दंश झेल रहा है।
रक्षा मंत्री का यह बयान इस्लामाबाद की एक मस्जिद पर हुए हालिया आतंकी हमले के बाद आया है, जिसमें 31 से अधिक बेगुनाह मारे गए। उन्होंने आंकड़ों के जरिए बताया कि ‘वार ऑन टेरर’ में शामिल होने की पाकिस्तान ने क्या कीमत चुकाई है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के हवाले से बताया गया कि इस लड़ाई में पाकिस्तान ने अपने 75,000 से अधिक नागरिकों और सैनिकों को खोया है। आर्थिक मोर्चे पर भी देश को 123 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का भारी नुकसान झेलना पड़ा, जबकि इसके बदले में अमेरिका से मदद के तौर पर केवल 20 अरब डॉलर ही मिले।
संबोधन के अंत में ख्वाजा आसिफ ने स्पष्ट किया कि तालिबान के साथ दुश्मनी मोल लेना और अमेरिकी एजेंडे पर चलना एक ऐसी रणनीतिक गलती थी, जिसकी भरपाई आने वाली कई पीढ़ियां भी नहीं कर पाएंगी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अब अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में कोई दूसरा देश हमारा इस्तेमाल न कर सके। इस बयान ने पाकिस्तान के भीतर मुशर्रफ और जियाउल हक के दौर की सैन्य नीतियों पर एक नई बहस छेड़ दी है, जबकि अमेरिका के साथ पहले से ही तनावपूर्ण चल रहे रिश्तों में और कड़वाहट आने की संभावना बढ़ गई है।
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