Modern Kiwi Farming
Modern Kiwi Farming : भारत के कृषि क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों से एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। देश के किसान अब गेहूं-धान जैसी पारंपरिक फसलों के चक्र से बाहर निकलकर व्यावसायिक बागवानी फसलों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। इन्हीं मुनाफे वाली फसलों में ‘कीवी’ की खेती सबसे प्रमुख होकर उभरी है, जो किसानों के लिए बंपर कमाई का एक बेहतरीन जरिया बन चुकी है। पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण बाजार में कीवी की मांग और इसके दाम साल भर ऊंचे बने रहते हैं।
यही वजह है कि अब देश के प्रगतिशील किसान अपने फार्म हाउस और खाली पड़े बागानों में बड़े पैमाने पर कीवी के पौधे लगा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि सही तकनीक, उन्नत किस्मों और शुरुआती वर्षों में पौधों की उचित देखरेख की जाए, तो कीवी की बागवानी से किसान दशकों तक लगातार मोटा मुनाफा कमा सकते हैं।
भारत में कीवी की व्यावसायिक बागवानी मुख्य रूप से देश के पहाड़ी और ठंडे वातावरण वाले राज्यों में की जा रही है। वर्तमान में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मेघालय जैसे ठंडे प्रदेशों के अलावा केरल और उत्तर प्रदेश के कुछ चुनिंदा ठंडे मैदानी इलाकों में भी इसकी खेती को सफलतापूर्वक बढ़ावा दिया जा रहा है। विशेष रूप से उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में किसान पारंपरिक खेती छोड़कर कीवी के कलमी (ग्राफ्टेड) पौधों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कलमी पौधों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इनसे बहुत ही कम समय में फल आना शुरू हो जाता है।
अगर इसकी प्रमुख किस्मों की बात करें, तो बाजार में ‘ग्रीन फ्लैश’ वैरायटी की मांग और खेती सबसे ज्यादा की जा रही है, जबकि प्रीमियम कैटेगरी में आने वाली ‘गोल्डन’ और ‘रेड फ्लैश’ जैसी विदेशी किस्मों का चलन भी भारतीय बागवानों के बीच अब काफी तेजी से बढ़ रहा है।
कीवी मूल रूप से एक शीतोष्ण यानी ठंडी जलवायु में पनपने वाली फसल है, इसलिए समुद्र तल से करीब 1000 से 2000 मीटर तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्र इसके बागानों के लिए सबसे सर्वोत्तम माने जाते हैं। जब बागान में पौधों की रोपाई की जा रही हो, तब वातावरण का सामान्य तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस के आसपास होना चाहिए। इसके साथ ही, इस बात का भी विशेष ध्यान रखना जरूरी है कि गर्मियों के मौसम में भी वहां का अधिकतम तापमान किसी भी सूरत में 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर न जाए, क्योंकि अत्यधिक गर्मी से इसके नाजुक पौधे झुलस सकते हैं। मिट्टी की बात करें तो कीवी के लिए गहरी, जीवांश युक्त, उपजाऊ और बेहतरीन जल निकासी की व्यवस्था वाली बलुई दोमट मिट्टी सबसे आदर्श मानी जाती है। मिट्टी का पीएच (pH) मान भी सामान्य होना चाहिए।
कीवी के नए और स्वस्थ पौधे तैयार करने के लिए बागवानी विशेषज्ञ मुख्य रूप से बडिंग (कलिकायान), ग्राफ्टिंग (कलम बांधना) और एयर लेयरिंग (गुटी विधि) जैसी उन्नत वैज्ञानिक विधियों का इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। हालांकि, यदि आप बड़े स्तर पर व्यावसायिक खेती की शुरुआत करने जा रहे हैं, तो सबसे सुरक्षित और बेहतर तरीका यही है कि किसी भी मान्यता प्राप्त सरकारी या निजी रजिस्टर्ड नर्सरी से पहले से तैयार उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित पौधे ही खरीदें। विशेषज्ञों का साफ कहना है कि शुरुआती दौर में ली गई अच्छी क्वालिटी की पौध ही भविष्य में बंपर और रोगमुक्त फल उत्पादन की गारंटी बनती है।
कीवी की फसल की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसे बहुत ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन पौधे के विकास के शुरुआती काल में मिट्टी में नियमित रूप से हल्की नमी का होना बेहद जरूरी है। इसके लिए कृषि वैज्ञानिक ‘ड्रिप इरिगेशन सिस्टम’ (टपक सिंचाई पद्धति) अपनाने पर विशेष जोर देते हैं। इस आधुनिक प्रणाली से न केवल पानी की भारी बचत होती है, बल्कि पौधों की जड़ों को जरूरत के अनुसार सटीक मात्रा में नमी मिलती रहती है। विशेषकर भीषण गर्मी के महीनों में समय पर सिंचाई करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। हालांकि, बागान में कभी भी पानी का भराव (वॉटरलॉगिंग) नहीं होना चाहिए; क्योंकि जड़ों के पास पानी रुकने से फफूंदी जनित रोग (फंगल इन्फेक्शन) और जड़ सड़न जैसी जानलेवा बीमारियां फैलने का खतरा काफी बढ़ जाता है, जो पूरी फसल को बर्बाद कर सकता है।
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