Konark Sun Temple
Konark Sun Temple : ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध 13वीं शताब्दी के कोणार्क सूर्य मंदिर को लेकर एक बड़ी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। मंदिर का मुख्य हिस्सा, जिसे ‘जगमोहन हॉल’ या गर्भगृह कहा जाता है, जल्द ही श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाएगा। पिछले 122 वर्षों से यह हिस्सा पूरी तरह से रेत से भरा हुआ था और इसके द्वार बंद थे। अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और आईआईटी मद्रास के विशेषज्ञों की एक संयुक्त टीम इस रेत को सुरक्षित रूप से निकालने के महा-अभियान में जुटी है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो एक साल के भीतर श्रद्धालु पहली बार इस प्राचीन मंदिर के आंतरिक वैभव का दर्शन कर सकेंगे।
कोणार्क मंदिर के गर्भगृह में रेत भरने का निर्णय ब्रिटिश शासनकाल के दौरान लिया गया था। साल 1903-04 में तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी जे.ए. बॉर्डियन ने देखा कि मंदिर का ढांचा कमजोर हो रहा है और इसकी 15 फीट ऊंची दीवारें कभी भी गिर सकती हैं। मंदिर को ढहने से बचाने के लिए उन्होंने मंदिर के मुख्य जगमोहन हॉल में हजारों टन रेत भरवा दी थी और इसके चारों ओर ऊंची दीवारें बनाकर इसे पूरी तरह सील कर दिया था। तब से आज तक किसी भी इंसान ने इस मंदिर के भीतर कदम नहीं रखा है।
ASI पुरी सर्किल के सुपरीटेंडेंट डी.बी. गढ़नायक के अनुसार, यह पुरातत्व विभाग के इतिहास का अब तक का सबसे जटिल और बड़ा ऑपरेशन है। 127 फीट ऊंचे इस मंदिर के भीतर से रेत निकालने के लिए आईआईटी मद्रास के विशेषज्ञों सहित 30 लोगों की टीम तैनात की गई है। इस प्रक्रिया में ‘जीरो वाइब्रेशन’ वाली डायमंड ड्रिल का उपयोग किया जा रहा है, ताकि मंदिर के ढांचे को कोई नुकसान न पहुँचे। 80 फीट की ऊंचाई पर ड्रिल करके रेत और पत्थरों के नमूने लिए गए हैं, जिनकी जांच आईआईटी की लैब में की जा रही है।
आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर अरुण मेनन ने इस कार्य को कई संवदेनशील चरणों में विभाजित किया है। जांच में पाया गया है कि गर्भगृह के भीतर की रेत समय के साथ 4-5 फीट नीचे धंस चुकी है, जिससे मंदिर के ऊपरी हिस्से में खाली स्थान बन गया है। विशेषज्ञों को डर है कि एक साथ रेत निकालने से पत्थर खिसक सकते हैं। इसलिए, हर बार रेत हटाने के साथ ही पत्थरों को कृत्रिम सपोर्ट दिया जाएगा। मंदिर के स्ट्रक्चर में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों पर नजर रखने के लिए 40 हाई प्रिसिजन सेंसर लगाए गए हैं, जो पल-पल का डेटा टीम को भेज रहे हैं।
रेत निकालने के बाद मंदिर के गर्भगृह का गहन निरीक्षण किया जाएगा। ASI का लक्ष्य है कि मंदिर के आंतरिक ढांचे को ठीक वैसा ही रूप दिया जाए, जैसा राजा नरसिंह देव (प्रथम) के शासनकाल में निर्माण के समय था। मंदिर के बाहरी हिस्से में खोंडालाइट और अंदरूनी हिस्से में लैटराइट पत्थरों का अनूठा संतुलन है। संरक्षण सहायक त्रैलोक्यनाथ बेहरे ने बताया कि इस अभियान का उद्देश्य मंदिर को अगले 1000 वर्षों तक सुरक्षित रखना है।
कोणार्क सूर्य मंदिर भारत की समुद्री शक्ति और खगोलीय ज्ञान का अद्भुत प्रतीक है। यह मंदिर अपनी नक्काशीदार पहियों और स्थापत्य कला के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। आंकड़ों के अनुसार, हर साल यहाँ 35 लाख से ज्यादा पर्यटक आते हैं। भारतीय स्मारकों में लोकप्रियता के मामले में यह ताजमहल के बाद दूसरे स्थान पर है। गर्भगृह खुलने के बाद यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या में भारी बढ़ोतरी होने की संभावना है, क्योंकि लोग सदियों पुराने इस रहस्य को करीब से देख सकेंगे।
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