Latur Municipal Election Results 2026: महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं के चुनावी घमासान में जहाँ कांग्रेस को कई झटके लगे, वहीं लातूर ने पार्टी की लाज बचाने का काम किया है। मुंबई समेत कई प्रमुख शहरों में पिछड़ने के बाद, कांग्रेस के लिए लातूर और चंद्रपुर से राहत भरी खबर आई है। 70 सीटों वाली लातूर नगर निगम में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने दम पर 40 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की है। दूसरी ओर, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) महज 20 के आंकड़े के आसपास सिमट कर रह गई। अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के खाते में केवल एक सीट आई। यह जीत कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य के अन्य हिस्सों में उसे महाविकास अघाड़ी (MVA) से अलग होकर चुनाव लड़ने का नुकसान उठाना पड़ा है।
विलासराव देशमुख पर टिप्पणी: बीजेपी के लिए बना आत्मघाती गोल
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लातूर में बीजेपी की हार की सबसे बड़ी वजह पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय विलासराव देशमुख के खिलाफ की गई अमर्यादित टिप्पणी रही। चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी नेता रवींद्र चव्हाण ने दावा किया था कि शहर से विलासराव देशमुख की यादों को 100 प्रतिशत मिटा दिया जाएगा। इस बयान ने लातूर की जनता की भावनाओं को आहत किया। हालांकि विवाद बढ़ने पर चव्हाण ने माफी मांगी और खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी डैमेज कंट्रोल की कोशिश की। फडणवीस ने स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र के निर्माण में विलासराव देशमुख का योगदान अतुलनीय है और वे उनका बेहद सम्मान करते हैं, लेकिन तब तक चुनावी नुकसान हो चुका था।
देशमुख परिवार की एकजुटता और रितेश देशमुख का भावुक जवाब
बीजेपी के इस बयान ने देशमुख भाइयों—अमित, रितेश और धीरज देशमुख—के पक्ष में एक नई ‘संजीवनी’ का काम किया। बॉलीवुड अभिनेता रितेश देशमुख ने अपने पिता के अपमान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि “जो नाम लोगों के दिलों में उकेरे गए हैं, उन्हें कोई सत्ता कभी नहीं मिटा सकती।” इस बयान ने मतदाताओं के बीच गहरा प्रभाव डाला। पिछले विधानसभा चुनावों में भले ही धीरज देशमुख को हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन इस निकाय चुनाव में बड़े भाई अमित देशमुख के नेतृत्व में कांग्रेस ने अपनी पकड़ मजबूत साबित की है। रितेश ने राजनीति में न होते हुए भी अपने परिवार की विरासत का मजबूती से बचाव किया।
2017 बनाम 2026: सत्ता की वापसी और राजनीतिक बदलाव
अगर हम 2017 के आंकड़ों पर गौर करें, तो उस समय मुकाबला बेहद करीबी था। तब बीजेपी को 36 सीटें मिली थीं और वह सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि कांग्रेस 33 सीटों पर अटक गई थी। सत्ता की साझेदारी के तहत आधा कार्यकाल बीजेपी और आधा कांग्रेस के पास रहा था। लेकिन इस बार की लहर ने पूरी तरह से पासा पलट दिया है। लातूर लोकसभा सीट पर कांग्रेस के शिवाजी कलगे की जीत के बाद अब नगर निगम पर पूर्ण कब्जे ने यह साफ कर दिया है कि लातूर आज भी कांग्रेस और देशमुख परिवार का गढ़ बना हुआ है। बीजेपी के लिए यह परिणाम आत्ममंथन का विषय है कि स्थानीय अस्मिता से जुड़े मुद्दों पर बयानबाजी कितनी महंगी पड़ सकती है।
मुंबई में झटका पर नागपुर में सुधार: कांग्रेस का मिला-जुला प्रदर्शन
महाराष्ट्र के समग्र परिदृश्य को देखें तो कांग्रेस का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। मुंबई में एमवीए से अलग होकर अकेले लड़ना कांग्रेस के लिए भारी पड़ा, जहाँ उसकी सीटें घटकर आधी रह गईं। हालांकि, नागपुर में पार्टी ने 2017 के मुकाबले अपनी स्थिति बेहतर की है और सीटों की संख्या में इजाफा किया है। सांगली मिराज कुपवड में भी पार्टी दूसरे स्थान पर रहकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल रही। चंद्रपुर में बीजेपी के साथ हुए कांटे के मुकाबले में कांग्रेस ने 30 सीटें जीतकर वहां भी अपनी पकड़ साबित की है। फिलहाल, लातूर की जीत ने महाराष्ट्र कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में एक नया जोश भर दिया है।
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