Lord Krishna
सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को ‘पूर्णावतार’ माना गया है, जिनका अर्थ है कि वे सभी सोलह कलाओं से परिपूर्ण हैं। उनका जीवन जहाँ हमें गीता के माध्यम से कर्म और धर्म का पाठ पढ़ाता है, वहीं उनकी लीलाएं तर्क और विज्ञान से परे हैं। श्रीकृष्ण के जीवन में कई ऐसे अवसर आए जब उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वे केवल सृष्टि के रक्षक ही नहीं, बल्कि नियंता भी हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि कान्हा ने अपने जीवनकाल में कई ऐसी आत्माओं को पुनः देह प्रदान की जो मृत्यु के आगोश में समा चुकी थीं। इन चमत्कारों ने यह स्थापित किया कि जो स्वयं ‘महाकाल’ हैं, उनके लिए मौत को परास्त करना मात्र एक खेल है।
श्रीकृष्ण की शिक्षा उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में हुई थी। जब उनकी शिक्षा पूर्ण हुई, तो गुरु सांदीपनि ने गुरु दक्षिणा के रूप में अपने उस पुत्र को वापस मांगा, जो वर्षों पहले प्रभास क्षेत्र में समुद्र में डूबकर लुप्त हो गया था। श्रीकृष्ण ने खोज शुरू की और उन्हें ज्ञात हुआ कि गुरु पुत्र को शंखासुर नामक दैत्य ले गया था और अब वह यमलोक पहुँच चुका है। अपने गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा दिखाते हुए श्रीकृष्ण और बलराम स्वयं यमराज के पास पहुँचे। भगवान की आज्ञा पाकर यमराज को उस बालक की आत्मा लौटानी पड़ी और श्रीकृष्ण ने उसे पुनः जीवित कर गुरु माता की गोद में डाल दिया।
कंस ने माता देवकी के छह पुत्रों का वध कर दिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी माता की पीड़ा को समझते हुए उन्हें उन छह पुत्रों से मिलवाने का संकल्प लिया। योगशास्त्र के अनुसार ये छह पुत्र वास्तव में पूर्व जन्म में हिरण्यकशिपु के पोते थे, जो एक शाप के कारण कंस के हाथों मारे गए थे। श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्तियों और योगबल से उन आत्माओं को सुतल लोक से वापस बुलाया। माता देवकी और वसुदेव ने न केवल अपने उन मृत पुत्रों के दर्शन किए, बल्कि श्रीकृष्ण ने उन्हें अंततः मुक्ति प्रदान कर मोक्ष के मार्ग पर भी अग्रसर किया।
महाभारत के युद्ध के उपरांत अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश का समूल विनाश करने के उद्देश्य से उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र का प्रहार किया। उस समय उत्तरा गर्भवती थीं और गर्भ में पल रहा शिशु (अभिमन्यु का पुत्र) मृतप्राय हो गया था। उस विकट परिस्थिति में भगवान श्रीकृष्ण ने सूक्ष्म रूप धारण कर उत्तरा के गर्भ में प्रवेश किया। उन्होंने अपनी सुदर्शन शक्ति और योगबल से ब्रह्मास्त्र की ज्वाला को शांत किया और उस मृत बालक को पुनः जीवन दान दिया। यही बालक आगे चलकर चक्रवर्ती राजा परीक्षित के नाम से विख्यात हुआ।
महाभारत युद्ध के दौरान ऐसी कई घटनाएं घटीं जहाँ श्रीकृष्ण ने मृत्यु के विधान को बदला। जब भीम के पौत्र बर्बरीक ने अपना शीश काटकर प्रभु को समर्पित किया, तो श्रीकृष्ण ने उसे वरदान दिया कि वह बिना शरीर के भी केवल कटे हुए सिर के साथ महाभारत का पूरा युद्ध देख सकेगा। उन्होंने बर्बरीक को युद्ध के अंत तक जीवित रखा। इसी प्रकार, जब मणिपुर में अर्जुन अपने ही पुत्र वभ्रुवाहन के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए, तब श्रीकृष्ण की ही प्रेरणा और निर्देश पर नागमणि के माध्यम से अर्जुन को पुनः जीवित किया गया।
भगवान श्रीकृष्ण की ये कथाएं केवल चमत्कार मात्र नहीं हैं, बल्कि यह भक्तों के विश्वास को सुदृढ़ करती हैं कि “जाको राखे साइयां, मार सके न कोय।” श्रीकृष्ण ने समय-समय पर यह दिखाया कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है, बल्कि वह भी परमात्मा के अधीन एक प्रक्रिया मात्र है। आज भी खाटू श्याम के रूप में बर्बरीक की पूजा हो या राजा परीक्षित की कथा, ये सभी प्रसंग हमें श्रीकृष्ण की अनंत महिमा और उनकी करुणा का बोध कराते हैं।
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