LPG Crisis India 2026: मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों ने वैश्विक सप्लाई चेन को हिलाकर रख दिया है। इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा जरूरतों पर पड़ने की आशंका गहरा गई है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, भारत सरकार ने अपने आपातकालीन अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए देश की तेल रिफाइनरियों को एक विशेष निर्देश जारी किया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि रिफाइनरियों को अब अपनी सामान्य क्षमता से अधिक लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) का उत्पादन करना होगा। इस कदम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि युद्ध के कारण विदेशी आयात में होने वाली किसी भी संभावित बाधा का असर भारतीय रसोई तक न पहुँचे और देश में कुकिंग गैस की कोई कमी न हो।
भारत की LPG निर्भरता: दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आयातक
भारत की ऊर्जा प्रोफाइल को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि हम अपनी रसोई गैस की जरूरतों के लिए विदेशी बाजारों पर भारी मात्रा में निर्भर हैं। वर्तमान में, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा LPG आयातक देश है। पिछले वित्तीय वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 33.15 मिलियन मीट्रिक टन कुकिंग गैस की खपत हुई थी। LPG, जो मुख्य रूप से प्रोपेन और ब्यूटेन गैसों का एक जटिल मिश्रण है, भारतीय घरों की जीवनरेखा बन चुकी है। इतनी विशाल मांग को अकेले घरेलू उत्पादन से पूरा करना फिलहाल असंभव है, जिसके कारण भारत को वैश्विक बाजार की उतार-चढ़ाव भरी कीमतों और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।
मिडिल ईस्ट का महत्व: 90% सप्लाई पर मंडराता खतरा
भारत की कुल LPG आवश्यकता का लगभग दो-तिहाई हिस्सा (60-70%) आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है। इसमें सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हमारे कुल आयात का करीब 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा सीधे तौर पर मिडिल ईस्ट के देशों से आता है। सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भारत के प्राथमिक आपूर्तिकर्ता हैं। मिडिल ईस्ट में जारी वर्तमान संघर्ष ने उन समुद्री रास्तों और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को असुरक्षित बना दिया है, जहाँ से गैस के टैंकर भारत पहुँचते हैं। यदि यह तनाव लंबे समय तक खिंचता है, तो भारत के लिए आयात की लागत बढ़ सकती है और सप्लाई में देरी हो सकती है, जिससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने अभी से ‘प्लान-बी’ पर काम शुरू कर दिया है।
रिफाइनरियों के लिए नई चुनौतियां और उत्पादन लक्ष्य
सरकार के नए आदेश के बाद, देश की प्रमुख तेल कंपनियों जैसे इंडियन ऑयल (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) को अपने प्रोडक्शन शेड्यूल में बदलाव करना होगा। रिफाइनरियों को अब कच्चे तेल के शोधन के दौरान निकलने वाली उप-उत्पादों (By-products) में LPG की मात्रा बढ़ाने के तकनीकी बदलाव करने होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू उत्पादन में मामूली वृद्धि भी अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकती है और संकट के समय एक ‘बफर स्टॉक’ तैयार करने में मदद करेगी। सरकार ने इन कंपनियों को नियमित रिपोर्टिंग करने और इन्वेंट्री लेवल को बनाए रखने के सख्त निर्देश दिए हैं।
महंगाई और आम आदमी पर प्रभाव: क्या बढ़ेंगे दाम?
सप्लाई प्रभावित होने का सीधा असर अक्सर कीमतों पर पड़ता है। हालांकि सरकार का प्राथमिक उद्देश्य अभी उपलब्धता सुनिश्चित करना है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और गैस की बढ़ती कीमतों का दबाव सरकारी खजाने पर पड़ना तय है। रिफाइनरियों को घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए कहना एक रणनीतिक कदम है ताकि बाजार में पैनिक (अफरा-तफरी) न फैले। यदि सरकार घरेलू स्तर पर पर्याप्त स्टॉक बनाए रखने में सफल रहती है, तो सब्सिडी के बोझ को संतुलित करते हुए आम उपभोक्ताओं को कीमतों के झटके से बचाया जा सकता है।
















