Mataamah Shradh 2025: मातामह श्राद्ध हर वर्ष पितृ पक्ष की समाप्ति के पश्चात आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। यह तिथि इस वर्ष 22 सितंबर 2025 (सोमवार) को है, जो शारदीय नवरात्रि की स्थापना का दिन भी है। यह श्राद्ध विशेष रूप से नाना-नानी यानी मातामह और मातामही के लिए किया जाता है।

ज्योतिषाचार्या एवं टैरो कार्ड रीडर नीतिका शर्मा, निदेशिका, श्री लक्ष्मीनारायण एस्ट्रो सॉल्यूशन, अजमेर के अनुसार, मातामह श्राद्ध का उद्देश्य मातृ पक्ष के पितरों की आत्मा की तृप्ति है। यह श्राद्ध सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करने वाला माना गया है।

मातामह श्राद्ध का महत्व
मातामह श्राद्ध उन दिवंगत पूर्वजों के लिए किया जाता है जो मां की ओर से हमारे परिवार में जुड़े होते हैं। यह श्राद्ध तर्पण व पिंडदान के माध्यम से किया जाता है और मातृ ऋण से मुक्ति दिलाता है।
मान्यता है कि जो संतान अपनी माता के कुल का श्राद्ध नहीं करती, वह मातृ दोष की भागी बनती है। मातामह श्राद्ध से मातृ कुल की आत्मा प्रसन्न होकर कुल को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती है।
कौन कर सकता है मातामह श्राद्ध?
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यदि किसी घर में संतान नहीं है, तो नाती (बेटी का पुत्र) श्राद्ध कर सकता है।
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परंपरा अनुसार, दत्तक पुत्र को भी यह अधिकार है और वह दो पीढ़ियों तक श्राद्ध कर सकता है।
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इस श्राद्ध को वही नाती करता है जिसकी मां (मृतका की पुत्री) के पति और पुत्र दोनों जीवित हों। यदि इनमें से किसी एक का भी देहांत हो चुका है, तो श्राद्ध नहीं किया जाता।
श्राद्ध की पवित्रता और शुद्धता
श्राद्ध कर्म में तीन तत्व विशेष पवित्र माने गए हैं:
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दौहित्र (पुत्री का पुत्र)
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कुतप काल (दोपहर का समय)
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तिल
ध्यान रखना चाहिए कि श्राद्ध शांति, श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाए। क्रोध, हड़बड़ी या लोभ से किया गया श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुंचता।
महिलाएं और श्राद्ध
धार्मिक ग्रंथों जैसे मनुस्मृति, धर्मसिंधु, गरुड़ पुराण के अनुसार, परिस्थिति विशेष में महिलाएं भी श्राद्ध और पिंडदान कर सकती हैं। पुत्र या पुरुष परिजन न होने पर कन्या या धर्मपत्नी भी श्राद्ध कर्म संपन्न कर सकती है।
श्राद्ध के लाभ
पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से मिलता है:
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आयु में वृद्धि
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संतान सुख
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यश और कीर्ति
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धन और अन्न की वृद्धि
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मानसिक और पारिवारिक शांति
मातामह श्राद्ध केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि संस्कार, संस्कृति और स्मृति का प्रतीक है। यह हमें हमारे मातृ पक्ष के ऋण से मुक्त करता है और कुल में सुख, शांति व समृद्धि का संचार करता है। ऐसे में 22 सितंबर 2025 को पूरे विधि-विधान के साथ मातामह श्राद्ध कर अपने पितरों को श्रद्धांजलि अर्पित करें।
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