छत्तीसगढ़

Madai Mela 2025: मां अंगार मोती मंदिर में आस्था का संगम, संतान सुख के लिए 1100 महिलाओं ने मांगी मन्नत

Madai Mela 2025 : छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले से लगभग 14 किलोमीटर दूर गंगरेल बांध के किनारे स्थित मां अंगार मोती मंदिर में आस्था का विशाल मेला—मड़ई मेला—संपन्न हुआ। इस पारंपरिक आयोजन में लाखों श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान 1100 से अधिक सुहागिन महिलाओं ने संतान प्राप्ति की कामना करते हुए मंदिर परिसर की जमीन पर लेटकर मां अंगार मोती से मन्नत मांगी।

दीपावली के बाद पहले शुक्रवार को लगता है मेला

हर वर्ष दीपावली के बाद आने वाले पहले शुक्रवार को मां अंगार मोती मंदिर में इस धार्मिक मेले का आयोजन किया जाता है, जिसे “गंगरेल मड़ई” भी कहा जाता है। महिलाएं अपने साथ नारियल, नींबू, अगरबत्ती और फूल लेकर मंदिर पहुंचती हैं और मां के चरणों में संतान सुख की कामना करती हैं।

महिलाओं के ऊपर से गुजरते हैं बैगा, देते हैं आशीर्वाद

मंदिर परिसर में इस वर्ष 52 गांवों के देव विग्रह और पारंपरिक पुजारी (बैगा) शामिल हुए। धार्मिक परंपरा के अनुसार, जमीन पर लेटी महिलाओं के ऊपर से बैगा गुजरते हुए उन्हें माता का आशीर्वाद देते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस प्रक्रिया से मां अंगार मोती देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है और महिलाओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

49 सालों से चली आ रही परंपरा

यह पवित्र परंपरा साल 1976 से लगातार निभाई जा रही है। पहले यह मेला चंवर गांव में आयोजित होता था, लेकिन गंगरेल बांध बनने के बाद वह गांव डूब गया। तब से यह मड़ई मेले का आयोजन हर वर्ष मां अंगार मोती मंदिर में किया जाता है। इस परंपरा को अब 49 वर्ष पूरे हो चुके हैं और हर साल इसकी भव्यता और श्रद्धा बढ़ती जा रही है।

निसंतान दंपतियों के लिए आशा का केंद्र

मां अंगार मोती मंदिर को निसंतान दंपतियों के लिए आस्था का केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि यहां आकर मन से प्रार्थना करने पर माता भक्तों की झोली संतान सुख से भर देती हैं। मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष जीव राखन लाल मरई के अनुसार, “धमतरी ही नहीं, बल्कि पड़ोसी जिलों से भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। कई दंपतियों ने यहां मन्नत मांगने के बाद संतान प्राप्ति की खुशी पाई है।”

आस्था, परंपरा और विश्वास का संगम

मां अंगार मोती मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का अनोखा संगम है। ग्रामीण इलाकों में इसे मातृत्व, आशा और भक्ति का पर्व कहा जाता है। महिलाओं के विश्वास और भक्ति से यह आयोजन न केवल स्थानीय संस्कृति को जीवित रखता है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए छत्तीसगढ़ की समृद्ध परंपराओं का प्रतीक बन गया है।

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