उत्तर प्रदेश

Magh Mela 2026: बसंत पंचमी पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान पर संकट, माघ मेला प्रशासन से ठनी

Magh Mela 2026:  प्रयागराज में आयोजित माघ मेले का माहौल इस समय भक्ति के साथ-साथ प्रशासनिक तनाव से भी भरा हुआ है। बसंत पंचमी के महत्वपूर्ण स्नान पर्व पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाएंगे या उनका धरना जारी रहेगा, इसे लेकर अभी भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। यह पूरा विवाद मौनी अमावस्या के दिन शुरू हुआ था, जो अब मेला प्रशासन और संत के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है। मेले की सुरक्षा व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं के बीच का यह टकराव अब सुलझने के बजाय और अधिक गहराता जा रहा है।

मौनी अमावस्या का वह दिन: आखिर कैसे शुरू हुआ प्रशासन और संत के बीच टकराव?

विवाद की जड़ें 18 जनवरी, मौनी अमावस्या के दिन में छिपी हैं। उस दिन मेले में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा था। प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के लिए कुछ मार्गों पर वाहनों और बड़े काफिलों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। मेला प्रशासन का आरोप है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने समर्थकों के साथ पालकी और रथ जैसे साधनों से प्रतिबंधित मार्ग से संगम की ओर बढ़ रहे थे। प्रशासन ने दावा किया कि बैरिकेड तोड़ने और नियमों के उल्लंघन से भगदड़ की स्थिति बन सकती थी, इसलिए उन्हें रोकना अनिवार्य था। वहीं, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे अपनी धार्मिक परंपराओं और संत मर्यादा का अपमान बताते हुए अपने शिविर के बाहर ही अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया।

प्रशासन का कड़ा रुख: ‘शंकराचार्य’ पदनाम और मेले से प्रतिबंध का नोटिस

विवाद तब और बढ़ गया जब प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। इस नोटिस में न केवल मौनी अमावस्या की अव्यवस्था पर सवाल उठाए गए, बल्कि उनके ‘शंकराचार्य’ पदनाम के उपयोग पर भी कड़ी आपत्ति जताई गई। प्रशासन का तर्क है कि सर्वोच्च न्यायालय में यह मामला लंबित है और पद का उपयोग करना कोर्ट की अवमानना है। नोटिस में यह भी पूछा गया कि क्यों न उनकी संस्था को दी गई भूमि और सुविधाएं निरस्त कर उन्हें भविष्य में मेले में आने से प्रतिबंधित कर दिया जाए।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पलटवार: ‘पालकी हमारी परंपरा है, बग्घी का आरोप निराधार’

प्रशासनिक नोटिस का स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पक्ष ने विस्तार से जवाब दिया है। उन्होंने ‘बग्घी’ के इस्तेमाल के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उनके पास कोई घोड़ा गाड़ी या मोटर संचालित वाहन नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे आदि शंकराचार्य के काल से चली आ रही 2,500 साल पुरानी परंपरा के अनुसार ‘पालकी’ से जा रहे थे, जिसे भक्त अपने कंधों पर ढो रहे थे। उनके समर्थकों का कहना है कि पालकी में लगे छोटे स्टील के पहिए केवल उसे सहारा देने के लिए हैं। शंकराचार्य पद के विवाद पर उन्होंने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों को धार्मिक उपाधियों पर सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है और इस मामले में कानूनी स्पष्टीकरण पहले ही दिया जा चुका है।

बसंत पंचमी की चुनौती: परंपरा, कानून और प्रशासनिक व्यवस्था का त्रिकोणीय संघर्ष

आज 23 जनवरी को बसंत पंचमी के अवसर पर सबकी निगाहें संगम तट पर टिकी हैं। माघ मेले का यह पर्व ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियां इसे प्रशासनिक और कानूनी टकराव का केंद्र बना चुकी हैं। प्रशासन अपनी सुरक्षा नियमावली पर अड़ा है, तो संत पक्ष अपने धार्मिक अधिकारों और सम्मान की मांग कर रहा है। यदि आज कोई सम्मानजनक समाधान नहीं निकलता, तो माघ मेले के आगामी पर्वों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ना तय है। यह विवाद अब केवल एक स्नान का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह परंपरा और आधुनिक कानून के बीच एक बड़े वैचारिक संघर्ष का रूप ले चुका है।

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