Mamata Banerjee Advocate : पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी गुरुवार सुबह एक बिल्कुल नए और चौंकाने वाले अवतार में नजर आईं। उन्हें कलकत्ता हाई कोर्ट परिसर में वकील की पारंपरिक पोशाक (काला कोट और बैंड) में देखा गया। ममता बनर्जी चुनाव के बाद हुई कथित हिंसा के मामले में खुद अदालत में पेश होकर बहस करने के लिए पहुंची थीं। मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बाद यह पहला मौका है जब वह एक सक्रिय वकील की भूमिका में सार्वजनिक रूप से सामने आई हैं। उनकी इस नई भूमिका ने न केवल कानूनी गलियारों बल्कि पूरे देश के राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।

चुनावी हिंसा का मामला: चीफ जस्टिस की बेंच में होगी सुनवाई
ममता बनर्जी की यह पेशी राज्य में चुनाव के बाद भड़की हिंसा से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) के सिलसिले में हुई है। राज्य के विभिन्न जिलों से खबरें आई थीं कि चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के कार्यालयों और कार्यकर्ताओं पर हमले किए गए हैं। इन आरोपों के मद्देनजर कलकत्ता हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसकी सुनवाई चीफ जस्टिस की खंडपीठ कर रही है। ममता बनर्जी ने इस संवेदनशील मामले में खुद अपनी पार्टी और कार्यकर्ताओं का पक्ष रखने का फैसला किया है। कानूनी जानकारों का मानना है कि ममता का खुद कोर्ट में बहस करना इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
सत्ता परिवर्तन और ममता का ‘आजाद पक्षी’ संकल्प
26वें विधानसभा चुनावों के परिणामों ने बंगाल की सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल दिया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 200 से अधिक सीटें जीतकर राज्य में पहली बार अपनी सरकार बनाई है, जबकि तृणमूल कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद आयोजित एक भावुक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता बनर्जी ने कहा था, “अब मेरे पास मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं है, मैं एक स्वतंत्र और ‘आजाद पक्षी’ की तरह हूं। मैं अब सड़कों पर उतरकर आम आदमी की लड़ाई लड़ूंगी।” उन्होंने स्पष्ट किया था कि वह अपनी कानून की डिग्री का उपयोग करते हुए एक वकील के तौर पर सक्रिय होंगी और अब हाई कोर्ट में उनकी मौजूदगी उनके इसी संकल्प का हिस्सा है।
सड़कों से अदालतों तक: विपक्षी नेता के रूप में नई रणनीति
ममता बनर्जी का वकील के रूप में कोर्ट में उतरना उनकी सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सत्ता गंवाने के बाद वह यह संदेश देना चाहती हैं कि वे संघर्ष से पीछे हटने वाली नहीं हैं। उन्होंने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे अब एक आम नागरिक के रूप में जनता के बीच रहेंगी। वकील के रूप में वे न केवल कानूनी लड़ाई लड़ेंगी, बल्कि राजनीतिक रूप से भी भाजपा सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगी। हाई कोर्ट में उनकी मौजूदगी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए काफी है, जो हार के बाद खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
कानूनी अनुभव और पिछला रिकॉर्ड: सुप्रीम कोर्ट तक की यात्रा
यह पहली बार नहीं है जब ममता बनर्जी ने कानूनी दांव-पेंच में अपनी सक्रियता दिखाई हो। इससे पहले, मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रोसेस’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी दलीलें दी थीं। हालांकि, उस समय वे सत्ता के शीर्ष पर थीं, लेकिन अब उनकी स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। एक पूर्व मुख्यमंत्री का इस तरह अपनी पुरानी पेशेवर पहचान को अपनाना भारतीय राजनीति में विरला ही देखने को मिलता है।
भविष्य की दिशा: क्या कानून बनेगा ममता का नया हथियार?
कलकत्ता हाई कोर्ट में ममता बनर्जी का वकील के लिबास में दिखना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में बंगाल की राजनीति केवल सड़कों पर ही नहीं, बल्कि अदालतों के भीतर भी तीखी होगी। ममता ने यह साबित कर दिया है कि वे हार को स्वीकार कर बैठने वालों में से नहीं हैं। अब देखना यह होगा कि चीफ जस्टिस की बेंच में वे किस तरह से अपनी दलीलें पेश करती हैं और चुनाव बाद हुई हिंसा के मामले में उनकी कानूनी पारी क्या रंग लाती है। उनकी यह सक्रियता भविष्य में विपक्षी एकता और आंदोलन को नई दिशा दे सकती है।
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