Mamata vs EC
Mamata vs EC: पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस वक्त हड़कंप मच गया जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बुधवार को देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश हुईं। मामला राज्य में चल रहे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) के तहत वोटर लिस्ट में किए जा रहे सुधारों से जुड़ा है। ममता बनर्जी ने अपनी याचिका में चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को “मनमाना” और “त्रुटिपूर्ण” करार दिया है। मुख्यमंत्री का आरोप है कि आगामी 2026 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाताओं की सूची में इस तरह का संशोधन करना एक सोची-समझी साजिश हो सकती है, जिससे बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम सूची से बाहर होने का खतरा मंडरा रहा है।
ममता बनर्जी की संवेदनशीलता और सुरक्षा को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर और भीतर सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं। बड़ी संख्या में पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है। मुख्यमंत्री बनर्जी मंगलवार को ही दिल्ली पहुंच गई थीं और उनके नाम पर बाकायदा आधिकारिक गेट पास जारी किया गया था। वह अपने वरिष्ठ वकीलों की टीम के साथ कोर्ट रूम नंबर एक में मौजूद हैं। सूत्रों का कहना है कि ममता इस मामले को कितनी गंभीरता से ले रही हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे खुद कानूनी बारीकियों पर नजर बनाए हुए हैं।
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख की सबसे बड़ी चिंता वोटर लिस्ट से नाम कटने को लेकर है। अपनी याचिका में उन्होंने मांग की है कि पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव पुरानी और स्थापित मतदाता सूची के आधार पर ही कराए जाएं। ममता के अलावा, टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेन और मोस्तारी बानू ने भी इसी तरह की चिंताएं जताते हुए याचिकाएं दायर की हैं। यह मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की तीन सदस्यीय विशेष पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है। टीएमसी नेताओं का तर्क है कि एसआईआर की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है।
इस सुनवाई का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि ममता बनर्जी ने व्यक्तिगत रूप से बहस करने की अनुमति मांगी है। बहुत कम लोग जानते हैं कि ममता बनर्जी के पास कोलकाता के प्रतिष्ठित जोगेश चंद्र चौधरी कॉलेज ऑफ लॉ से कानून (LLB) की डिग्री है। उन्होंने एक अंतरिम आवेदन दायर कर कहा है कि वे इस मामले की याचिकाकर्ता होने के साथ-साथ संवैधानिक प्रोटोकॉल से भी अच्छी तरह वाकिफ हैं। उन्होंने कोर्ट को भरोसा दिलाया है कि वे एक मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा और स्थापित नियमों का पूरी तरह पालन करेंगी और अपनी दलीलें खुद पेश करेंगी।
स्पेशल इंटेंसिव रिविजन के तहत चुनाव आयोग घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करता है और नई सूची तैयार करता है। ममता बनर्जी का तर्क है कि बंगाल की भौगोलिक और जनसांख्यिकीय स्थिति को देखते हुए यह प्रक्रिया दोषपूर्ण हो सकती है। उनका दावा है कि संवैधानिक अधिकारों के तहत आर्टिकल 32 के जरिए वे अपने नागरिकों के मताधिकार की रक्षा के लिए कोर्ट आई हैं। अब सबकी निगाहें जस्टिस सूर्यकांत की बेंच पर टिकी हैं कि क्या वे चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया पर रोक लगाते हैं या ममता बनर्जी को खुद बहस करने की अनुमति प्रदान करते हैं।
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