Manipur Violence
Manipur Violence : मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच भड़की जातीय हिंसा को आज तीन साल पूरे हो चुके हैं। 37 लाख की आबादी वाले इस सीमावर्ती राज्य में शांति अब भी एक सपना बनी हुई है। आलम यह है कि दोनों समुदायों के लोग आज भी खौफ के साये में जीने को मजबूर हैं। राज्य की भौगोलिक स्थिति दो हिस्सों में बंट चुकी है—मैतेई समुदाय के लोग इंफाल घाटी से ऊपर कुकी बहुल पहाड़ी इलाकों में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, और यही स्थिति कुकी समुदाय की है। डर की मुख्य वजह दोनों ओर के हथियारबंद ‘वॉलेंटियर’ हैं, जो छोटी सी चिंगारी पर भी अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर देते हैं।
देश के शीर्ष सैन्य सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार ने नक्सलवाद पर प्रभावी नियंत्रण पाने के बाद अब अपना पूरा ध्यान पूर्वोत्तर के उग्रवाद पर केंद्रित कर दिया है। सरकार ने इसके लिए ‘मिशन 2029’ का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस रणनीति के तहत उग्रवाद को जड़ से खत्म करने की शुरुआत आगामी अमरनाथ यात्रा के बाद होने की संभावना है। वर्तमान में राज्य में 50 से ज्यादा उग्रवादी समूह सक्रिय हैं। सरकार की योजना ‘बातचीत और प्रहार’ की दोहरी नीति पर आधारित है। पहले राजनीतिक वार्ता के जरिए समाधान तलाशा जाएगा, लेकिन जहां उग्रवादी अड़ियल रुख अपनाएंगे, वहां सुरक्षा बल आक्रामक सैन्य कार्रवाई करेंगे।
राज्य सरकार के सूत्रों के मुताबिक, उग्रवाद प्रभावित इलाकों में भारी सुरक्षा बल तैनात करने की तैयारी है। जो बल अब तक नक्सलवाद विरोधी अभियानों में लगा था, उसे अब मणिपुर और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों जैसे असम, अरुणाचल और नागालैंड में शिफ्ट किया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य अगले लोकसभा चुनाव से पहले इस अशांति को पूरी तरह नियंत्रित करना है। उग्रवादियों से निपटने के लिए अत्याधुनिक ‘माइन प्रोटेक्टर’ गाड़ियों की पहली खेप भी मणिपुर पहुंच चुकी है, जो बारूदी सुरंगों और बम धमाकों के बीच सुरक्षा बलों को सुरक्षित रखेगी।
हिंसा की इस आग में सबसे ज्यादा मासूम पिस रहे हैं। 7 अप्रैल को ट्रोंगलाओबी में संदिग्ध उग्रवादियों के बम धमाके में मारे गए दो मासूम बच्चों का अंतिम संस्कार आखिरकार 25 दिन बाद शनिवार को किया गया। परिवार ने न्याय की मांग को लेकर बच्चों के शवों को मुर्दाघर में रखा था। बच्चों की दादी का कहना है कि सरकार ने उन्हें नौकरी और पैसे का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया, क्योंकि उन्हें सिर्फ और सिर्फ न्याय चाहिए। यह घटना दर्शाती है कि मणिपुर में मानवीय पीड़ा किस स्तर तक पहुंच चुकी है।
3 मई 2023 से शुरू हुई इस त्रासदी में अब तक करीब 60 हजार लोग विस्थापित हो चुके हैं। ये लोग अपने ही राज्य में शरणार्थी बनकर 174 राहत शिविरों में रह रहे हैं। हालांकि राज्य की कमान अब नए मुख्यमंत्री युमनम खेमचंद सिंह के हाथों में है, लेकिन जमीन पर हालात अब भी जस के तस हैं। शिविरों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण अब तक 30 लोग दम तोड़ चुके हैं। राज्य सरकार इन्हें मात्र 100 रुपये प्रतिदिन का गुजारा भत्ता दे रही है, जो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।
मणिपुर हिंसा में अब तक 250 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और 14 हजार से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई 11 जघन्य मामलों की जांच कर रही है, जिसमें यौन उत्पीड़न की घटनाएं भी शामिल हैं। वहीं, जस्टिस बलवीर सिंह चौहान का पैनल हिंसा के कारणों की जांच कर रहा है, जिसकी रिपोर्ट 20 मई को पेश होनी है। एनआईए भी मोरेह में पुलिस अधिकारी की हत्या और बच्चों की मौत जैसे मामलों की अलग से जांच कर रही है, ताकि दोषियों को कड़ी सजा दिलाई जा सके।
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