Mother’s Milk Poison: क्या होगा अगर कोई नवजात बच्चा अपनी मां का दूध पिए और उस दूध में यूरेनियम का अंश भी मिल जाए? यह सवाल बिहार के एक अध्ययन के बाद खड़ा हुआ है, जिसमें यह पाया गया है कि राज्य के विभिन्न इलाकों से स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध में यूरेनियम की मात्रा पाई गई है। महावीर कैंसर संस्थान, पटना द्वारा किए गए इस शोध में यह साबित हुआ कि बिहार के कुछ जिलों की माताओं के दूध में यूरेनियम (U-238) पाया गया है।
Mother’s Milk Poison: महावीर कैंसर संस्थान का शोध
महावीर कैंसर संस्थान, पटना के वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन को 2021 से 2024 तक किया। इस शोध में बिहार के बेगूसराय, भोजपुर, समस्तीपुर, खगड़िया, कटिहार और नालंदा जैसे जिलों से स्तनपान कराने वाली 40 महिलाओं के दूध के नमूने एकत्र किए गए थे। इन नमूनों की जांच से पता चला कि इन सभी में यूरेनियम (U-238) पाया गया है। अध्ययन में यह भी देखा गया कि इस दूध में यूरेनियम की मात्रा 0 से 5.25 जी/एल के बीच रही।
Mother’s Milk Poison: यूरेनियम की मात्रा और स्वास्थ्य पर प्रभाव
ब्रिटिश जर्नल ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ ने इस अध्ययन की रिपोर्ट में खुलासा किया कि इन नमूनों में यूरेनियम का स्तर 5 पीपीबी (प्रति अरब भाग) तक था। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि अधिकांश शिशुओं में संभावित स्वास्थ्य जोखिम काफी कम था। अध्ययन के सह-लेखक और एम्स दिल्ली के डॉ. अशोक शर्मा ने कहा कि यूरेनियम की यह मात्रा शिशुओं के लिए स्वास्थ्य के लिहाज से हानिकारक नहीं है, क्योंकि यह सीमा अनुमेय सीमा से नीचे है।
संभावित स्वास्थ्य जोखिम और निष्कर्ष
डॉ. अशोक शर्मा ने अध्ययन के निष्कर्षों को स्पष्ट करते हुए कहा कि 70% शिशुओं में यूरेनियम के संपर्क में आने से कोई भी कार्सिनोजेनिक (कैंसर उत्पन्न करने वाले) जोखिम नहीं देखा गया। इसके बावजूद, उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि लंबे समय तक यूरेनियम के संपर्क में रहने से शिशुओं के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है। बावजूद इसके, उन्होंने सलाह दी कि स्तनपान कराने वाली माताओं को शिशुओं को स्तनपान कराना जारी रखना चाहिए, क्योंकि इस समय तक इसके किसी भी गंभीर प्रभाव का कोई संकेत नहीं मिला है।
पीने के पानी और प्राकृतिक यूरेनियम का स्तर
इस अध्ययन के निष्कर्षों पर विशेषज्ञों ने भी अपनी राय दी है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के पूर्व समूह निदेशक और परमाणु वैज्ञानिक डॉ. दिनेश के असवाल ने इस अध्ययन को चिंता का विषय नहीं माना। उन्होंने कहा कि जिन स्तरों पर यूरेनियम पाया गया है, वह पूरी तरह से सुरक्षित हैं। उन्होंने उदाहरण के तौर पर बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित पीने के पानी में यूरेनियम की अनुमेय सीमा 30 पीपीबी है, जबकि बिहार के दूध में पाए गए यूरेनियम का स्तर उस से लगभग छह गुना कम था।
सुरक्षित सीमा के भीतर यूरेनियम का स्तर
डॉ. असवाल ने इस अध्ययन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यूरेनियम का यह स्तर खतरनाक नहीं है, और माताओं को बिना किसी चिंता के अपने बच्चों को स्तनपान कराना जारी रखना चाहिए। उन्होंने बताया कि यूरेनियम प्राकृतिक रूप से पृथ्वी की मिट्टी में पाया जाता है और इसके अंश पानी, हवा, और भोजन के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करते हैं। हालांकि, स्तनपान कराने वाली माताओं द्वारा यूरेनियम का अधिकांश हिस्सा मूत्र के माध्यम से उत्सर्जित हो जाता है, और दूध में इसका स्तर बहुत कम रहता है।
यूरेनियम के प्रभाव और बायो-एक्यूमुलेशन
इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह था कि स्तनपान करने वाले शिशुओं में यूरेनियम के प्रभाव का पता लगाया जाए। यूरेनियम एक भारी धातु है जो शरीर में जमा हो सकती है, लेकिन यह बायो-एक्यूमुलेटिव नहीं है, यानी यह शरीर में जमा नहीं रहता। इस प्रकार, शिशुओं के लिए यूरेनियम का जोखिम बहुत कम है, क्योंकि इसका अधिकांश भाग शरीर से बाहर निकल जाता है। इसके अलावा, इस स्तर पर यूरेनियम की कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या उत्पन्न होने की संभावना नहीं है, जैसा कि डॉ. शर्मा और डॉ. असवाल ने कहा।
माताओं को चिंता करने की आवश्यकता नहीं
सारांश के रूप में, यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण संकेत देता है कि यूरेनियम के निम्न स्तर से शिशुओं पर किसी गंभीर स्वास्थ्य प्रभाव का खतरा नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि माताओं को अपने शिशुओं को स्तनपान कराना जारी रखना चाहिए, क्योंकि यह प्रक्रिया बच्चे की सेहत के लिए सबसे फायदेमंद है। हालांकि, यह अध्ययन बिहार के कुछ क्षेत्रों में यूरेनियम के प्रसार के बारे में चिंताएँ भी उठाता है, जो भविष्य में पर्यावरणीय स्वास्थ्य पर विचार करने का संकेत देता है।
भविष्य में क्या कदम उठाए जाएंगे?
इस शोध के परिणामों के बाद, यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि पर्यावरणीय सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं पर अधिक ध्यान दिया जाए। हालांकि, इस समय तक इस अध्ययन से जुड़े खतरे सीमित हैं, लेकिन भविष्य में इस प्रकार के प्रदूषण और उसके प्रभाव पर और अधिक शोध करने की आवश्यकता होगी। सरकार और पर्यावरणीय संगठन इस विषय पर गहरी नजर रखेंगे और आवश्यक उपाय करेंगे, ताकि शिशुओं और उनके स्वास्थ्य को किसी भी प्रकार के खतरे से बचाया जा सके।