Naxal couple surrender : छत्तीसगढ़ से सटे तेलंगाना राज्य में एक बड़े नक्सली दंपती ने लगभग चार दशक बाद हथियार डाल दिए। माला संजीव उर्फ लेंगू दादा (62) और उनकी पत्नी पेरुगुल्ला पार्वती (50) ने आत्मसमर्पण किया है। दोनों दंडकारण्य विशेष क्षेत्रीय समिति (DKSZCM) के सीनियर कैडर में शामिल थे। दोनों पर 25-25 लाख रुपये का इनाम घोषित था। इस नक्सली दंपती ने छत्तीसगढ़ के बस्तर और बीजापुर क्षेत्रों में करीब 20 से 22 साल तक सक्रिय रहकर नक्सली विचारधारा का प्रचार किया। इन दोनों की गतिविधियों में शामिल रहना सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। दोनों करीब तीन बार मुठभेड़ों से बाल-बाल बचे।
लेंगू दादा ने 1980 में पीपुल्स वॉर ग्रुप से जुड़कर अपने नक्सली सफर की शुरुआत की थी। शुरूआती दौर में वह जन नाट्य मंडली (JNM) का हिस्सा रहा, जिसका उद्देश्य सांस्कृतिक माध्यमों से नक्सली विचारधारा को जनता तक पहुंचाना था। उन्होंने भारत के 16 राज्यों में घूमकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए लोगों को प्रभावित किया।
संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बाद 1996 में उसे सशस्त्र शाखा में शामिल किया गया। बाद में वह डिवीजन कमेटी मेंबर (DVCM) बना और एटूनगरम, पांडव, महादेवपुर जैसे दलमों में काम किया। वर्ष 2001 में राज्य समिति सदस्य (SCM) बना और 2003 में उसे दंडकारण्य क्षेत्र में भेज दिया गया, जहां उसे चेतना नाट्य मंडली (CNM) का प्रमुख बनाया गया।
2003 से 2022 तक, लेंगू दादा ने बस्तर के घने जंगलों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से आदिवासियों को नक्सली संगठन से जोड़ने का काम किया। उसकी जिम्मेदारी थी कि वह स्थानीय युवाओं को संगठन की तरफ आकर्षित करे। उसने प्रचार-प्रसार और संगठन विस्तार में अहम भूमिका निभाई।
लेंगू दादा 2002 में जिला बॉर्डर इलाके में हुई एक गोलीबारी से बच निकला। वहीं 2005 में बीजापुर के राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में भी वह मुठभेड़ से बच गया। उसकी पहली पत्नी पंजला सरोज उर्फ विद्या, जो खुद भी नक्सली थी, 2002 में मुलुगु जिले में मुठभेड़ के दौरान मारी गई। इसके बाद 2007 में उसने पार्वती से शादी की।
पेरुगुल्ला पार्वती ने 1992 में नक्सली संगठन में प्रवेश किया था। वह नल्लामाला क्षेत्र में काम करती थी। 1998 में एरिया कमेटी मेंबर (ACM) बनी और 2004 में विशाखापट्टनम जिले के गलीकोंडा एरिया दलम में SCM बनकर गई। 2007 में DKSZCM के तहत छत्तीसगढ़ भेजी गई, जहां वह सांस्कृतिक उप-समिति की सदस्य रही। 2017 में अबूझमाड़ क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में पार्वती बाल-बाल बची थी। इसके बाद वह कुछ समय तक भूमिगत रही और फिर दोबारा संगठन में सक्रिय हो गई। उसने माओवादी नेताओं के साथ मिलकर कई रणनीतिक फैसलों में भूमिका निभाई।
आत्मसमर्पण के दौरान दोनों नक्सलियों ने हिंसा और संगठन की खोखली विचारधारा से मोहभंग होने की बात कही। उन्होंने कहा कि अब वे शांति और मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं और भविष्य में सामाजिक कार्यों के जरिए समाज की सेवा करेंगे। लेंगू दादा और पार्वती का आत्मसमर्पण सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी सफलता माना जा रहा है। ये दोनों लंबे समय से नक्सली संगठन की रीढ़ माने जाते थे। इनके सरेंडर से संगठन को गंभीर झटका लगा है। साथ ही यह कदम उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा बन सकता है जो आज भी हिंसा के रास्ते को परिवर्तन का माध्यम मानते हैं।
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