राजनीति

NCP Internal : एनसीपी की चुनावी बैठक में अंदरूनी विवाद खुलकर सामने आया, महाराष्ट्र राजनीति में बढ़ी हलचल

NCP Internal : महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है. इसी कड़ी में उप मुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की एक बेहद महत्वपूर्ण और उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई. आगामी महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव (एमएलसी) और राज्यसभा चुनाव की रणनीतियों को लेकर बुलाई गई इस बैठक का माहौल उस समय तनावपूर्ण हो गया, जब पार्टी के दो सबसे दिग्गज और वरिष्ठ नेता आपस में भिड़ गए. दरअसल, राज्य में विधान परिषद और राज्यसभा के चुनाव बेहद नजदीक हैं, जिसके चलते पार्टी को समय रहते अपने मजबूत उम्मीदवारों के नामों का चयन करना है. यह पूरी बैठक इसी गंभीर विषय पर चर्चा करने के लिए बुलाई गई थी, लेकिन टिकट बंटवारे और अंदरूनी राजनीति को लेकर सुनील तटकरे और छगन भुजबल के बीच जमकर जुबानी तीर चले और तीखी बहस देखने को मिली.

उम्मीदवारों के नामों पर मंथन के दौरान आपस में भिड़े सुनील तटकरे और छगन भुजबल

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस महत्वपूर्ण बैठक का मुख्य एजेंडा आगामी चुनावों के लिए उम्मीदवारों की अंतिम सूची तैयार करना था. इसके साथ ही पार्टी संगठन को मजबूत करने और कुछ अन्य अंदरूनी सांगठनिक मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा होनी थी. हालांकि, जैसे ही बैठक की कार्यवाही आगे बढ़ी, वरिष्ठ नेता सुनील तटकरे और छगन भुजबल के बीच वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आ गए. दोनों नेताओं के बीच किसी बात को लेकर बहस इतनी बढ़ गई कि पूरी बैठक का माहौल ही बदल गया. इस वाकये के बाद से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि एनसीपी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और टिकटों के बंटवारे को लेकर नेताओं में आपसी खींचतान मची हुई है.

तटकरे ने बयां किया अपना दर्द, पूछा— मुश्किल वक्त में शीर्ष नेतृत्व ने क्यों नहीं दिया साथ?

बैठक के दौरान सुनील तटकरे ने बेहद नाराजगी जताते हुए अपनी ही पार्टी के नेताओं के सामने एक बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया. उन्होंने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि जब भी पार्टी को आगे बढ़ाने या किसी विवादित मुद्दे पर स्टैंड लेने की बात आती है, तो सिर्फ कुछ चुनिंदा नेताओं को ही विरोधियों की तीखी आलोचनाओं का शिकार क्यों होना पड़ता है? तटकरे ने सीधे तौर पर सवाल उठाया कि जब वे मुश्किल दौर से गुजर रहे थे, तब पार्टी का कोई भी विधायक या शीर्ष नेतृत्व का बड़ा चेहरा उनके समर्थन में खुलकर आगे क्यों नहीं आया? तटकरे के इस आक्रामक और भावुक रुख ने बैठक में मौजूद अन्य नेताओं को भी हैरान कर दिया.

छगन भुजबल ने तटकरे के बयानों पर जताई कड़ी आपत्ति, कहा— अंदरूनी बैठक में ऐसे मुद्दों की जरूरत नहीं

सुनील तटकरे के इन आरोपों और तीखे सवालों पर पार्टी के दूसरे कद्दावर नेता छगन भुजबल ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई. भुजबल ने तटकरे को टोकते हुए साफ तौर पर कहा कि यह पार्टी की एक महत्वपूर्ण आंतरिक बैठक है, जिसका उद्देश्य आगामी चुनावों के लिए उम्मीदवारों का चयन करना है. ऐसे में इस मंच पर इस तरह के व्यक्तिगत और भावनात्मक मुद्दों को उठाने की कोई आवश्यकता नहीं थी. भुजबल का मानना था कि ऐसे विवादों से पार्टी की छवि पर विपरीत असर पड़ता है और कार्यकर्ताओं के बीच गलत संदेश जाता है. इस टोक-टाक के बाद दोनों नेताओं के बीच काफी देर तक बहस होती रही.

गरमा-गरमी के बीच पार्थ पवार ने छोड़ी बैठक, प्रफुल्ल पटेल की अनुपस्थिति पर दी गई सफाई

नेताओं के बीच जारी इस जबरदस्त गरमा-गरमी का असर बैठक में मौजूद युवा नेतृत्व पर भी देखने को मिला. बताया जा रहा है कि जैसे ही सुनील तटकरे का मुख्य भाषण शुरू होने वाला था, उससे ठीक पहले युवा नेता पार्थ पवार अचानक बैठक छोड़कर बाहर चले गए, जिससे सस्पेंस और बढ़ गया. इसके अलावा, पार्टी के एक और सबसे वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल भी इस पूरी बैठक से नदारद रहे. हालांकि, पटेल की अनुपस्थिति को लेकर बाद में पार्टी की ओर से आधिकारिक सफाई पेश की गई. प्रफुल्ल पटेल ने स्पष्ट किया कि उनका पहले से ही एक बेहद जरूरी और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम तय था, जिसकी लिखित जानकारी उन्होंने बैठक शुरू होने से पहले ही पार्टी आलाकमान को दे दी थी.

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सूची से नाम गायब होने के बाद बढ़ी राजनीतिक गलियारों में हलचल

एनसीपी की इस अंदरूनी लड़ाई को राजनीतिक विश्लेषक बेहद गंभीरता से ले रहे हैं. इस हलचल को और अधिक हवा इसलिए भी मिल रही है क्योंकि कुछ समय पहले ही पार्टी की ओर से भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को एक आधिकारिक सूची सौंपी गई थी. पार्टी की इस नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सूची से सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल दोनों ही बड़े नेताओं के नाम अचानक गायब थे. इस घटनाक्रम के तुरंत बाद हुई इस बैठक में इस तरह का हाई-वोल्टेज ड्रामा होना यह साफ संकेत देता है कि पार्टी के भीतर सांगठनिक पदों और टिकटों को लेकर शीर्ष नेताओं के बीच एक अदृश्य जंग छिड़ी हुई है, जो आने वाले दिनों में और गहरा सकती है.

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