Nepal Election
Nepal Election 2026: नेपाल की राजनीति के ‘भीष्म पितामह’ कहे जाने वाले और पांच बार देश की सत्ता की कमान संभाल चुके शेर बहादुर देउबा के साढ़े तीन दशक लंबे गौरवशाली चुनावी सफर पर विराम लग गया है। उनके सचिवालय ने आधिकारिक घोषणा की है कि 79 वर्षीय देउबा आगामी 5 मार्च को होने वाले प्रतिनिधि सभा के चुनावों में हिस्सा नहीं लेंगे। इस निर्णय को नेपाल के सियासी इतिहास में एक बड़े युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। देउबा का मैदान छोड़ना केवल एक व्यक्ति का संन्यास नहीं, बल्कि नेपाल की सत्ता संरचना में आने वाले एक बड़े बदलाव का संकेत है।
शेर बहादुर देउबा के इस अचानक फैसले के पीछे पिछले कुछ समय में मिले गहरे राजनीतिक झटके माने जा रहे हैं। साल 2024 में जब नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल के बीच सत्ता की साझेदारी का समझौता हुआ था, तब देउबा को उम्मीद थी कि वे छठी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होंगे। हालांकि, नियति को कुछ और ही मंजूर था। पिछले साल सितंबर में हुए ‘Gen G’ विद्रोह ने केपी शर्मा ओली की सरकार को उखाड़ फेंका और देउबा के प्रधानमंत्री बनने के अरमानों पर पानी फेर दिया। इस विद्रोह ने नेपाल की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था।
देउबा के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनकी अपनी ही पार्टी, नेपाली कांग्रेस के भीतर से आई। गगन थापा के नेतृत्व में युवाओं और बागियों ने देउबा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। स्थिति तब और बदतर हो गई जब चुनाव आयोग के एक फैसले के कारण पार्टी का आधिकारिक नाम और चुनाव चिह्न भी उनके गुट के हाथ से निकल गया। गगन थापा की अगुआई वाली केंद्रीय कार्यसमिति ने देउबा को उनके अपने ही गढ़ ‘डडेलधुरा’ निर्वाचन क्षेत्र में हाशिए पर धकेल दिया और वहां से उनके वफादार नैन सिंह महर को टिकट दे दिया। अपनों के इस विश्वासघात ने देउबा को डिफेंसिव मोड में ला दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देउबा ने चुनाव न लड़ने का फैसला पार्टी को संभावित बिखराव से बचाने के लिए लिया है। गगन थापा के बढ़ते प्रभाव और युवा नेतृत्व की मांग के बीच देउबा समझ चुके थे कि अब संघर्ष के बजाय गरिमापूर्ण तरीके से विदाई लेना ही श्रेयस्कर है। उनके इस फैसले ने पार्टी के भीतर चल रहे गृहयुद्ध को शांत करने का काम किया है। हालांकि, देउबा का हटना उनके समर्थकों के लिए एक बड़ा भावनात्मक झटका है, जो उन्हें एक बार फिर देश के नेतृत्व करते देखना चाहते थे।
नेपाल की राजनीति में वर्तमान में एक बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। जहाँ एक ओर शेर बहादुर देउबा ने चुनावी राजनीति से किनारा कर लिया है, वहीं केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ जैसे दिग्गज अब भी अपनी पार्टियों पर पकड़ बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। देउबा का यह कदम संकेत देता है कि नेपाल की जनता अब नए चेहरों और आधुनिक सोच वाले नेतृत्व की ओर देख रही है। युवाओं के बढ़ते दबाव ने पुराने सूरमाओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब बागडोर अगली पीढ़ी को सौंपने का समय आ गया है।
5 मार्च को होने वाले चुनाव अब देउबा के बिना लड़े जाएंगे, जो पिछले कई दशकों में पहली बार होगा। देउबा ने अपने लंबे करियर में नेपाल के लोकतंत्र को कई उतार-चढ़ाव से गुजरते देखा है। उनके संन्यास के बाद अब नेपाली कांग्रेस की कमान पूरी तरह से गगन थापा और उनके सहयोगियों के हाथ में आने की संभावना है। नेपाल की जनता इस सत्ता परिवर्तन और पुराने दिग्गजों के अवसान को किस तरह लेती है, यह चुनाव परिणामों से साफ हो जाएगा। फिलहाल, नेपाल एक नई राजनीतिक दिशा की ओर कदम बढ़ा चुका है।
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