अंतरराष्ट्रीय

Nepal: Gen-Z आंदोलन में 76 मौतों के लिए पूर्व PM ओली और पूर्व गृहमंत्री पर FIR, न्यायिक जांच शुरू

Nepal: नेपाल में हाल ही में उभरे Gen-Z आंदोलन ने न केवल देश की राजनीति को हिला कर रख दिया, बल्कि अब इस आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और मौतों को लेकर गंभीर कानूनी कार्रवाई भी शुरू हो गई है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक के खिलाफ काठमांडू जिला पुलिस कार्यालय में आपराधिक मामला दर्ज किया गया है।

क्या है पूरा मामला?

8 सितंबर 2025 को शुरू हुआ Gen-Z आंदोलन भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सोशल मीडिया पर लगे सरकारी प्रतिबंधों के खिलाफ युवाओं का एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन था। लेकिन पहले ही दिन पुलिस द्वारा बिना चेतावनी की गई गोलीबारी में 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई। अगले दो दिनों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 76 तक पहुंच गई।

इस घटना ने पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ा दी। युवाओं के गुस्से और हिंसक प्रदर्शन के चलते कई सरकारी भवनों को नुकसान पहुंचा और हालात इतने बिगड़ गए कि प्रधानमंत्री ओली को 9 सितंबर 2025 को इस्तीफा देना पड़ा।

अंतरिम सरकार और आगामी चुनाव

ओली के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने 12 सितंबर को पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया। इसके अगले ही दिन संसद भंग कर दी गई और 5 मार्च 2026 को आम चुनाव की घोषणा कर दी गई।

राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रजिस्ट्रेशन की तारीखें भी तय कर दी गई हैं। मौजूदा दल 16 से 26 नवंबर के बीच पंजीकरण कर सकते हैं, जबकि नई पार्टियों को 15 नवंबर तक रजिस्ट्रेशन कराना होगा।

FIR के कानूनी मायने

काठमांडू के पुलिस अधीक्षक पवन भट्टराई ने पुष्टि की है कि यह FIR युवाओं द्वारा दर्ज कराई गई है, जिसमें ओली और लेखक को आंदोलन के दौरान हुई मौतों और हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। यह मामला अब न्यायिक जांच आयोग को सौंप दिया गया है, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस गौरी बहादुर कार्की कर रहे हैं।

एक सीनियर एडवोकेट के अनुसार, यह एफआईआर राजनीतिक नेतृत्व की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने की दिशा में एक अहम कदम है। इससे 8-9 सितंबर को हुए कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की विस्तृत जांच का रास्ता खुलेगा। नेपाल में Gen-Z आंदोलन सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक जनक्रांति बन चुका है। यह घटना बताती है कि अब देश का युवा वर्ग सिर्फ अपनी बात कहने के लिए खड़ा नहीं हो रहा, बल्कि जवाबदेही की भी मांग कर रहा है। आने वाले चुनाव और न्यायिक जांच यह तय करेंगे कि नेपाल किस दिशा में आगे बढ़ेगा—विकास और लोकतंत्र की ओर या फिर दमन और अस्थिरता की ओर।

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