Nepal Monarchy News: नेपाल की राजधानी काठमांडू एक बार फिर ‘गणतंत्र बनाम राजतंत्र’ के वैचारिक संघर्ष का अखाड़ा बन गई है। त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उस समय अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिले, जब पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के स्वागत के लिए सैकड़ों की संख्या में समर्थक जमा हो गए। हवाई अड्डे के बाहर खड़े समर्थकों ने ‘राजा लाओ, देश बचाओ’ और ‘राजशाही बहाल करो’ जैसे गगनभेदी नारे लगाए। यह भीड़ केवल स्वागत के लिए नहीं, बल्कि देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को एक खुली चुनौती देने के उद्देश्य से जुटी थी। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नेपाल के एक बड़े वर्ग में वर्तमान गणतांत्रिक व्यवस्था के प्रति असंतोष बढ़ रहा है।

प्रशासनिक पाबंदियों की अनदेखी: सुरक्षा घेरा तोड़कर पहुंचे समर्थक
हवाई अड्डे पर सुरक्षा के मद्देनजर काठमांडू जिला प्रशासन ने पहले ही धारा-144 जैसी सख्त पाबंदियां लागू कर रखी थीं, जिसके तहत पांच से अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक थी। प्रशासन ने भारी संख्या में पुलिस बल भी तैनात किया था, लेकिन राजतंत्र समर्थकों के उत्साह के आगे ये तमाम इंतजाम बौने साबित हुए। सुबह से ही लोग हाथों में पूर्व राजा की तस्वीरें, पोस्टर और बैनर लेकर हवाई अड्डे के मुख्य द्वार पर डट गए। इस बड़े शक्ति प्रदर्शन का नेतृत्व राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी के दिग्गज नेता कमल थापा, नवराज सुबेदी और चर्चित व्यवसायी व कार्यकर्ता डॉक्टर दुर्गा प्रसाई जैसे प्रभावशाली चेहरों ने किया, जिससे इस आंदोलन को और मजबूती मिली।
हिंदू राष्ट्र और राजतंत्र की मांग: 5 मार्च के चुनाव पर संकट के बादल
नेपाल में आगामी 5 मार्च को आम चुनाव होने वाले हैं, लेकिन चुनाव से ठीक पहले राजतंत्र समर्थकों की बढ़ती सक्रियता ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए डॉक्टर दुर्गा प्रसाई ने दो टूक शब्दों में कहा कि वे नेपाल को फिर से एक ‘हिंदू राष्ट्र’ के रूप में देखना चाहते हैं जिसकी कमान एक ‘हिंदू राजा’ के हाथ में हो। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जब तक उनके एजेंडे पर विचार नहीं किया जाता, तब तक देश में निष्पक्ष चुनाव कराना संभव नहीं होगा। समर्थकों का तर्क है कि 2008 में राजशाही के खात्मे के बाद से नेपाल राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और आर्थिक बदहाली का शिकार हुआ है, जिसका समाधान केवल राजतंत्र ही है।
इतिहास के पन्ने: 240 साल पुरानी राजशाही का अंत और ज्ञानेंद्र शाह का सफर
नेपाल का राजतंत्रीय इतिहास बेहद गौरवशाली और उतार-चढ़ाव भरा रहा है। साल 2001 में हुए भीषण राजदरबार हत्याकांड के बाद ज्ञानेंद्र शाह ने सत्ता संभाली थी। हालांकि, उनका शासनकाल संघर्षों से घिरा रहा। 2005 में उनके द्वारा संसद भंग कर आपातकाल लगाने के फैसले ने जनता को उनके खिलाफ कर दिया, जिससे 2006 के जनआंदोलन की नींव पड़ी। अंततः, 2008 में संविधान सभा ने 240 साल पुराने राजतंत्र को समाप्त कर नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित कर दिया। तब से पूर्व राजा ज्ञानेंद्र एक आम नागरिक की तरह अपने निजी आवास ‘निर्मल निवास’ में रह रहे हैं और अधिकतर सामाजिक व पर्यावरणीय कार्यों में व्यस्त रहते हैं।
बदलती राजनीतिक हवा: क्या फिर लौटेगा राजा का शासन?
पिछले कुछ वर्षों में नेपाल की सड़कों पर राजशाही के पक्ष में बढ़ता जनसमर्थन राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर रहा है। वर्तमान गणतांत्रिक सरकार की आंतरिक कलह और आर्थिक मोर्चे पर विफलता ने आम जनता के एक बड़े हिस्से को पुराने दिनों की याद दिला दी है। विश्लेषकों का मानना है कि हालांकि राजतंत्र की वापसी संवैधानिक रूप से एक जटिल प्रक्रिया है, लेकिन जिस तरह से पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के प्रति जनता का झुकाव बढ़ रहा है, उसे देखते हुए भविष्य में किसी बड़े उलटफेर की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। नेपाल अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ लोकतंत्र की जड़ें और राजतंत्र की यादें एक साथ टकरा रही हैं।

















