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Subhash Chandra Bose 129th Jayanti: जब अंग्रेजों को चकमा देने के लिए ‘मौलवी’ बने थे नेताजी, पढ़ें उनके ‘ग्रेट एस्केप’ की रोमांचक कहानी

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रखर नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज 129वीं जयंती है। पूरा देश उस वीर योद्धा को याद कर रहा है जिसने ‘आजाद हिंद फौज’ का गठन कर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। नेताजी की देशभक्ति केवल नारों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनका पूरा जीवन हैरतअंगेज कारनामों और साहस से भरा था। उनकी वीरता का एक महत्वपूर्ण पहलू वह समय था, जब उन्होंने भारत से बाहर निकलने और अंतरराष्ट्रीय मदद जुटाने के लिए अपनी पहचान पूरी तरह बदल ली थी। अंग्रेजों की कड़ी घेराबंदी को तोड़कर निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं था।

कोलकाता से पलायन: मौलवी जियाउद्दीन बनकर अंग्रेजों की आंखों में झोंकी धूल

1941 में जब नेताजी को कोलकाता में उनके ही घर में नजरबंद किया गया था, तब अंग्रेजों को लगा था कि उन्होंने इस शेर को पिंजरे में कैद कर लिया है। लेकिन नेताजी ने छत्रपति शिवाजी महाराज की रणनीति अपनाई। वे रात के अंधेरे में चुपचाप पहरेदारों को चकमा देकर बाहर निकल गए। उस समय उन्होंने एक लंबी दाढ़ी रखी और एक धर्मपरायण मुस्लिम का वेश धारण किया। उनका नया नाम था— ‘मौलवी जियाउद्दीन’। इसी भेष में उन्होंने कोलकाता से पेशावर तक का लंबा और खतरनाक सफर तय किया। राजधानी दिल्ली में खुफिया जासूसों की भीड़ के बीच से वे जियाउद्दीन बनकर फ्रंटियर मेल में सवार हुए और सुरक्षित पेशावर पहुँच गए।

पेशावर में पठानी वेशभूषा: जब गूंगा-बहरा पठान बनकर पार की सीमाएं

पेशावर पहुँचने पर नेताजी का स्वागत उनके फॉरवर्ड ब्लॉक के साथी अकबर शाह ने किया। अकबर शाह ने उनके लिए खास पठानी सलवार-कमीज का इंतजाम किया था। वहां उन्हें ‘आबाद खान’ के घर छिपाया गया। कबीलाई इलाकों और सीमावर्ती क्षेत्रों में पहचान छुपाने के लिए उन्हें पश्तो भाषा और वहां के रीति-रिवाजों की ट्रेनिंग दी गई। ताकि कोई उन पर शक न करे, उन्हें एक गूंगा-बहरा पठान बना दिया गया। यह पहचान इतनी पुख्ता थी कि कोई भी जासूस यह अंदाजा नहीं लगा पाया कि इस साधारण से दिखने वाले पठान के भीतर भारत की आजादी का सबसे बड़ा क्रांतिकारी छिपा है।

अंतरराष्ट्रीय सफर: औरलेंडो मेजेरेटा से कमांडर मक्सूदा तक के कई नाम

नेताजी की पहचान बदलने का सिलसिला केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। जब वे जर्मनी पहुँचे, तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सुरक्षा कारणों से उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘औरलेंडो मेजेरेटा’ (Orlando Mazzotta) रख लिया। इसके बाद जब उन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के चरम के दौरान सबमरीन (पनडुब्बी) के जरिए जर्मनी से जापान जाना था, तब खतरा और भी बढ़ गया था। गहरे समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियों और युद्धपोतों से बचते हुए उन्होंने ‘कमांडर मक्सूदा’ का छद्म नाम अपनाया। पल-पल मौत के साये में जीने के बावजूद नेताजी का संकल्प अडिग था।

अमर बलिदान: पहचान बदलती रही पर लक्ष्य हमेशा ‘पूर्ण स्वराज’ रहा

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी पहचान कई बार बदली—कभी वे मौलवी बने, कभी पठान, तो कभी विदेशी नागरिक। लेकिन इन तमाम रूपों के पीछे उनका उद्देश्य केवल एक ही था—भारत माँ की बेड़ियों को काटना। आज उनकी 129वीं जयंती पर यह किस्से हमें याद दिलाते हैं कि आजादी हमें किसी उपहार में नहीं मिली, बल्कि इसके लिए नेताजी जैसे नायकों ने अपना घर, अपनी पहचान और अंततः अपना जीवन तक दांव पर लगा दिया था। उनका अदम्य साहस आज भी करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।

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