Nishikant Dubey
Nishikant Dubey: भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में आरोप-प्रत्यारोप का दौर एक नए चरम पर पहुँच गया है। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर और फायरब्रांड सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के विरुद्ध मोर्चा खोलते हुए राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। दुबे ने राहुल गांधी के विरुद्ध न केवल तीखे शब्दों का प्रयोग किया, बल्कि उनके आचरण और निष्ठा पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। भाजपा सांसद ने राहुल गांधी को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का मार्गदर्शक करार देते हुए सदन से उनकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द करने की पुरजोर मांग की है। इस बयान के बाद संसद से लेकर सड़क तक चर्चाओं का बाजार गर्म है।
निशिकांत दुबे ने केवल मौखिक आरोप ही नहीं लगाए, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर कुछ कथित दस्तावेज साझा कर सनसनी फैला दी। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के संबंध विवादास्पद अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस और फोर्ड फाउंडेशन जैसे संगठनों से हैं। दुबे ने तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि क्या राहुल गांधी सत्ता हथियाने की लालसा में देश के विभाजन की कोई गुप्त साजिश रच रहे हैं? उन्होंने राहुल की हालिया विदेश यात्राओं—विशेषकर वियतनाम, कंबोडिया, बहरीन और थाईलैंड—को निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया कि इन दौरों का असली मकसद देशविरोधी तत्वों से मुलाकात करना था।
भाजपा सांसद ने राहुल गांधी पर देश की लोकतांत्रिक बुनियाद को जानबूझकर खोखला करने का आरोप लगाया है। दुबे के अनुसार, राहुल गांधी का आचरण संसदीय मर्यादाओं के प्रतिकूल है क्योंकि वे अक्सर निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका, संविधान और यहाँ तक कि लोकसभा अध्यक्ष जैसी गरिमामयी संस्थाओं पर निराधार टिप्पणियाँ करते रहते हैं। निशिकांत दुबे ने इसे ‘अमर्यादित व्यवहार’ की श्रेणी में रखते हुए एक विशेष संसदीय समिति के गठन की मांग की है, जो राहुल गांधी के बयानों और उनके विदेशी संपर्कों की गहनता से जांच कर सके। उनका तर्क है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए ऐसी जांच अनिवार्य है।
संसदीय रणनीति के तहत निशिकांत दुबे ने सदन की कार्यप्रणाली के नियम 352(5) और 353 का हवाला देते हुए एक विशेष चर्चा के लिए नोटिस दिया है। उनका स्पष्ट उद्देश्य राहुल गांधी के खिलाफ एक ऐसा विशिष्ट प्रस्ताव पारित करवाना है, जिससे उनकी वर्तमान सदस्यता तो जाए ही, साथ ही भविष्य में उनके चुनाव लड़ने पर भी वैधानिक रोक लग सके। दुबे का मानना है कि देश की सुरक्षा और लोकतांत्रिक शुचिता के साथ समझौता करने वाले किसी भी व्यक्ति को सदन में रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। यह कदम कांग्रेस और विपक्षी खेमे के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
जैसे ही निशिकांत दुबे ने सदन के पटल पर अपनी बात रखनी शुरू की, विपक्षी सांसदों, विशेषकर कांग्रेस सदस्यों ने इसका तीव्र विरोध किया। सदन में शोर-शराबा और नारेबाजी इतनी बढ़ गई कि पीठासीन सभापति कृष्णा प्रसाद तेन्नेटी के लिए कार्यवाही चलाना असंभव हो गया। हंगामे को देखते हुए सदन की कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित कर दी गई। यह टकराव स्पष्ट करता है कि आने वाले दिनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ध्रुवीकरण और गहराने वाला है। अब राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें लोकसभा अध्यक्ष के विवेक पर टिकी हैं कि क्या वे इस विवादित प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति देते हैं या नहीं।
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