Chemist Strike 2026
Chemist Strike 2026 : देशभर के स्वास्थ्य क्षेत्र से आज एक बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां मेडिकल स्टोर संचालकों ने अपनी मांगों को लेकर दवाखाने बंद रखने का ऐलान किया है। इस देशव्यापी हड़ताल का आह्वान फार्मासिस्ट, केमिस्ट और दवा डिस्ट्रीब्यूटरों के सबसे बड़े संगठन ‘ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट’ (AIOCD) द्वारा किया गया है। दवा कारोबारियों का मुख्य विरोध ऑनलाइन फार्मेसी कंपनियों को सरकार द्वारा दी जा रही अनुचित छूट और सहूलियतों को लेकर है। उनका मानना है कि ई-फार्मेसी के बढ़ते चलन से पारंपरिक दवा विक्रेताओं के व्यापार पर गहरा संकट मंडरा रहा है।
आंकड़ों की बात करें तो वर्तमान में पूरे देश के भीतर लगभग 7 से 8 लाख दवा दुकानें संचालित हो रही हैं, जबकि अकेले देश की राजधानी दिल्ली में इनकी संख्या तकरीबन 15 हजार के आसपास है। इस हड़ताल का व्यापक असर देखने को मिल रहा है, हालांकि राहत की बात यह है कि कुछ चुनिंदा राज्यों में स्थानीय दवा संगठनों ने बातचीत के बाद अपनी हड़ताल वापस ले ली है, जिससे वहां आंशिक राहत मिली है।
केमिस्टों के इस आंदोलन के बीच अब दिल्ली-एनसीआर के नागरिकों को एक और बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है। आगामी 21 से 23 मई तक ट्रांसपोर्टरों ने पूर्ण चक्काजाम करने की घोषणा कर दी है। तीन दिनों तक चलने वाली इस ट्रक हड़ताल का मुख्य कारण दिल्ली सरकार द्वारा बाहरी कमर्शियल वाहनों पर लगाए जाने वाले ग्रीन टैक्स में की गई बेतहाशा बढ़ोतरी है। ट्रांसपोर्ट संघ इस टैक्स वृद्धि का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, ट्रांसपोर्टर प्रशासन के उस आदेश से भी बेहद नाराज हैं, जिसके तहत आगामी 1 नवंबर से दिल्ली के बाहर पंजीकृत बीएस-4 (BS-IV) श्रेणी के वाहनों के राजधानी में प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। इस दोहरी मार से नाराज होकर ट्रांसपोर्ट संगठनों ने सड़कों पर उतरने का फैसला किया है।
टैक्स दरों में हुए बदलावों पर नजर डालें तो दिल्ली प्रशासन ने हल्के कमर्शियल वाहनों पर लगने वाले ग्रीन टैक्स को 1800 रुपये से बढ़ाकर सीधे 2400 रुपये कर दिया है। वहीं दूसरी ओर, भारी कमर्शियल वाहनों के लिए इस टैक्स की राशि को 2 हजार रुपये से दोगुना करते हुए सीधे 4 हजार रुपये प्रति वाहन कर दिया गया है।
‘ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस’ (AIMTC) का स्पष्ट रूप से कहना है कि पहले से ही पेट्रोल और डीजल की आसमान छूती कीमतों से जूझ रहे ट्रांसपोर्टरों की कमर इस नए ग्रीन टैक्स ने तोड़कर रख दी है। इस अतिरिक्त आर्थिक बोझ के कारण उनका पूरा कारोबार ठप होने की कगार पर पहुंच गया है, जिससे इस क्षेत्र से जुड़े लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है।
ट्रांसपोर्ट यूनियन ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए प्रशासन की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संगठन के मुताबिक, बीते 1 अप्रैल से अब तक सरकार ने ग्रीन टैक्स के माध्यम से 93 करोड़ रुपये से भी अधिक का भारी-भरकम राजस्व कमाया है। लेकिन इस एकत्रित राशि का आधा हिस्सा भी पर्यावरण सुधार या ट्रांसपोर्टरों की भलाई पर खर्च नहीं किया गया है।
इसी वजह से ट्रांसपोर्ट यूनियन ने दिल्ली सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) से इस बढ़ी हुई टैक्स दरों को तत्काल प्रभाव से वापस लेने की पुरजोर मांग की है। उनका तर्क है कि यह विशेष टैक्स केवल उन्हीं वाहनों पर लागू किया जाना चाहिए जो बिना रुके सिर्फ दिल्ली की सीमाओं से होकर गुजरते हैं।
यूनियन के पदाधिकारियों का आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर न केवल माल से लदे हुए वाहनों से, बल्कि खाली ट्रकों से भी जबरन ग्रीन टैक्स वसूला जा रहा है। जबकि अदालत का स्पष्ट दिशा-निर्देश था कि यह टैक्स केवल दिल्ली को बाईपास करने वाले गुजरने वाले वाहनों के लिए ही मान्य होगा।
इसके साथ ही, ट्रांसपोर्टरों की यह भी मांग है कि प्रदूषण मुक्त और आधुनिक तकनीक वाले बीएस-6 (BS-VI) भारी वाहनों को बिना किसी रोक-टोक के शहर के भीतर प्रवेश की अनुमति दी जाए। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद एमसीडी (MCD) के टोल बैरियर अवैध रूप से सड़कों पर काम कर रहे हैं और वसूली में लगे हैं।
इस महाहड़ताल के व्यापक असर को देखते हुए आम जनता के मन में दैनिक आवश्यकताओं को लेकर कई आशंकाएं हैं। हालांकि, ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि तीन दिनों के इस चक्काजाम के दौरान आम जनता की सहूलियत का पूरा ध्यान रखा जाएगा। दूध, फल, सब्जियां और दवाइयों जैसी अत्यंत आवश्यक वस्तुओं की गाड़ियों को इस हड़ताल के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है, ताकि आवश्यक आपूर्ति बाधित न हो।
गौरतलब है कि दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे प्रमुख इलाकों में फैले लगभग 47 बड़े ट्रांसपोर्ट संगठन इस आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे हैं। यदि समय रहते सरकार और कमर्शियल वाहन मालिकों के बीच आम सहमति नहीं बनी, तो पूरे एनसीआर क्षेत्र की माल आपूर्ति व्यवस्था चरमरा सकती है।
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