Opium Farming
Opium Farming : अफीम की खेती को भारत में सबसे ज्यादा संवेदनशील और चर्चा में रहने वाली नकदी फसलों में से एक माना जाता है. इसकी मुख्य वजह सिर्फ इसकी बाजार में ऊंची कीमत होना नहीं है, बल्कि इसके पीछे लागू होने वाले कड़े और सख्त सरकारी नियम-कानून भी हैं. पूरी दुनिया में भारत उन बेहद चुनिंदा देशों की सूची में शुमार है, जहां सरकार की सीधी देखरेख और सख्त निगरानी में कानूनी तरीके से अफीम उगाने की इजाजत दी जाती है. इतना ही नहीं, भारत को विश्व का एकमात्र ऐसा देश माना जाता है, जहां वैध रूप से ‘गम अफीम’ का उत्पादन किया जाता है. इस अफीम का इस्तेमाल स्वास्थ्य क्षेत्र में मार्फिन और कोडीन जैसी जीवनरक्षक दवाएं बनाने में होता है, जो गंभीर दर्द निवारक के रूप में मेडिकल जरूरतों को पूरा करती हैं.
भारत के हर राज्य या क्षेत्र में अफीम की खेती करने की आजादी नहीं है. इसके लिए केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाले सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स (CBN) से बकायदा लिखित लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य होता है. यह विभाग हर साल देश के कुछ विशेष और चिन्हित इलाकों के लिए ही लाइसेंस जारी करता है. वर्तमान समय में केवल मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ गिने-चुने जिलों में ही कानूनी रूप से इसकी खेती की जाती है. राजस्थान के चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, झालावाड़, कोटा और भीलवाड़ा इसके सबसे बड़े उत्पादक केंद्र हैं. वहीं, मध्य प्रदेश के नीमच और मंदसौर जिले भी अफीम उत्पादन के लिए वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हैं. राज्यवार आंकड़ों को देखें तो राजस्थान पूरे देश में अफीम की खेती में शीर्ष स्थान पर काबिज है, जबकि जिलों में प्रतापगढ़ सबसे आगे है.
अफीम की फसल सामान्य फसलों की तुलना में बहुत अधिक नाजुक और कड़ी मेहनत की मांग करती है. इसकी बुवाई का सही समय अक्टूबर से नवंबर महीने के बीच का होता है. अच्छी पैदावार के लिए खेत की कई बार गहरी जुताई करनी पड़ती है और भारी मात्रा में जैविक खाद या वर्मी कंपोस्ट डालना होता है. इसके अतिरिक्त उत्तम किस्म के बीज, समय पर सिंचाई, कीटनाशक, चौबीसों घंटे खेत की सुरक्षा और मजदूरों की दिहाड़ी को मिलाकर 5 बीघा खेत में अफीम उगाने का कुल खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाता है. चूंकि यह पूरी प्रक्रिया नारकोटिक्स विभाग की रडार पर होती है, इसलिए खेत की पैमाइश से लेकर फसल की हर स्तर पर होने वाली सरकारी जांच का भी रिकॉर्ड रखना पड़ता है.
अफीम की खेती से होने वाला मुनाफा सीधे तौर पर फसल की कुल पैदावार और सरकार द्वारा तय की गई न्यूनतम खरीद कीमत पर निर्भर करता है. यदि मौसम अनुकूल रहे और किसान को बंपर पैदावार मिले, तो यह खेती पारंपरिक फसलों के मुकाबले कई गुना ज्यादा आर्थिक लाभ दे सकती है. हालांकि, इसमें जोखिम भी उतना ही बड़ा होता है. सरकार द्वारा प्रति हेक्टेयर अफीम की औसत मात्रा (औसत गाढ़ता) का एक कड़ा मापदंड तय किया जाता है; यदि किसी प्राकृतिक आपदा या बीमारी के कारण उत्पादन उस सरकारी पैमाने से कम रह जाता है, तो अगले साल के लिए किसान का लाइसेंस रद्द होने या रिन्यू न होने का खतरा मंडराने लगता है.
सरकार किसानों से पूरी अफीम खुद खरीदती है और इसके लिए विशेष तौल केंद्र बनाए जाते हैं. बिना वैध सरकारी लाइसेंस के अफीम की खेती करना एक गैर-जमानती और गंभीर अपराध है, जिसमें लंबी जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है.
ठंड के मौसम में बोई जाने वाली अफीम की फसल में बुवाई के करीब 3 से 4 महीने बाद खूबसूरत फूल आने शुरू हो जाते हैं. जब ये फूल पूरी तरह परिपक्व होकर झड़ने लगते हैं, तब पौधों पर हरे रंग के डोडे (Capsules) तैयार होते हैं. अफीम निकालने के लिए एक्सपर्ट मजदूरों द्वारा इन डोडों पर दोपहर बाद एक विशेष औजार से हल्का चीरा लगाया जाता है. रात भर में उस चीरे से दूधिया रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ बाहर निकलकर जमा हो जाता है.
अगले दिन सुबह धूप तेज होने से पहले इस जमे हुए पदार्थ को खुरचकर इकट्ठा किया जाता है, जो बाद में हवा के संपर्क में आकर अफीम का रूप ले लेता है. कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, इस दौरान खेत में खरपतवार नियंत्रण और सटीक सिंचाई का विशेष ख्याल रखना पड़ता है. अंत में डोडों के पूरी तरह सूख जाने पर उनके भीतर से बेशकीमती खसखस के बीज भी निकाले जाते हैं, जो बाजार में महंगे दामों पर बिकते हैं.
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