Bilawal Bhutto Statement : भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर चल रहे तनाव के बीच पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने एक और भड़काऊ बयान देकर माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है। उन्होंने भारत को सीधे युद्ध की धमकी देते हुए कहा कि यदि भारत सिंधु जल संधि को निलंबित रखता है और नदी पर डैम बनाना जारी रखता है, तो पाकिस्तान युद्ध का रास्ता अख्तियार करेगा।
बिलावल भुट्टो ने पाकिस्तान की जनता से एकजुट होने की अपील करते हुए कहा, “हमें मोदी सरकार के जुल्म के खिलाफ आवाज उठानी होगी। पाकिस्तान की अवाम में इतनी ताकत है कि हम जंग में भारत का मुकाबला कर सकते हैं। हम अपने 6 के 6 दरिया वापस लेकर रहेंगे।” उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान ने कभी युद्ध नहीं छेड़ा, बल्कि हमेशा शांति की बात की है। “लेकिन अगर भारत ने जंग थोपी, तो पाकिस्तान पीछे नहीं हटेगा,” उन्होंने कहा।
इससे पहले अमेरिका दौरे पर गए पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर ने भी भारत को परमाणु युद्ध की अप्रत्यक्ष धमकी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर भारत ने सिंधु जल संधि को रद्द किया और बांध बनाना जारी रखा, तो पाकिस्तान मिसाइल से इन बांधों को नष्ट कर देगा। मुनीर ने यह भी कहा था, “अगर हमें डुबाने की कोशिश की गई, तो हम आधी दुनिया को साथ लेकर डूबेंगे। हमारे पास मिसाइलों की कमी नहीं है।”
1950 के दशक में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई सिंधु जल संधि अब एक बार फिर विवाद की जड़ बन गई है। भारत ने हाल ही में संधि के कार्यान्वयन को लेकर पुनर्विचार की बात कही थी और जम्मू-कश्मीर में डैम निर्माण की योजनाएं तेज कर दी हैं। पाकिस्तान का दावा है कि इससे उनके हिस्से में आने वाले पानी की आपूर्ति पर असर पड़ेगा, जो वहां की कृषि और जनजीवन के लिए जरूरी है।
मुनीर ने कहा कि भारत के कदम से 25 करोड़ पाकिस्तानी भुखमरी के खतरे से जूझ रहे हैं। हालांकि, भारत की ओर से बार-बार यह स्पष्ट किया गया है कि वह संधि के तहत अपने सभी दायित्वों का पालन कर रहा है।
भारत सरकार की ओर से अब तक भुट्टो या मुनीर के बयानों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन राजनयिक हलकों में इन बयानों को चुनावी और आंतरिक राजनीतिक दबावों से प्रेरित माना जा रहा है।
पाकिस्तान की सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व द्वारा दिए जा रहे ऐसे बयानों से क्षेत्रीय शांति पर खतरा मंडराने लगा है। सिंधु जल संधि जैसी ऐतिहासिक संधि को लेकर उकसावेभरे शब्दों और परमाणु युद्ध की धमकियों से न केवल द्विपक्षीय संबंधों में तनाव बढ़ सकता है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए भी खतरा बन सकता है।
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