Pati Patni Aur Woh 2 Review
Pati Patni Aur Woh 2 Review : बॉलीवुड सिनेमा में जब भी किसी सुपरहिट और कल्ट कॉमेडी फिल्म का सीक्वल या अगला भाग दर्शकों के बीच आता है, तो सिनेमाप्रेमियों की उम्मीदें सातवें आसमान पर पहुंच जाती हैं। साल 2019 में आई कार्तिक आर्यन, भूमि पेडनेकर और अनन्या पांडे की फिल्म ‘पति पत्नी और वो’ ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी जबरदस्त कॉमेडी के दम पर खूब गदर मचाया था। अब ठीक उसी तर्ज पर निर्देशक मुदस्सर अजीज इस मजेदार फ्रेंचाइजी का दूसरा हिस्सा ‘पति पत्नी और वो 2’ लेकर बड़े पर्दे पर लौटे हैं। हालांकि, इस बार कहानी में ‘पति’ का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है। छोटे शहरों के मध्यमवर्गीय किरदारों को सिल्वर स्क्रीन पर जीवंत करने में माहिर माने जाने वाले अभिनेता आयुष्मान खुराना इस बार मुख्य भूमिका में हैं, जो प्रयागराज की गलियों में ‘वो’ के चक्कर में बुरी तरह फंसते हुए नजर आ रहे हैं।
फिल्म की पटकथा उत्तर प्रदेश के मशहूर संगम नगरी प्रयागराज से शुरू होती है। यहां दर्शकों की मुलाकात प्रजापति पांडेय (आयुष्मान खुराना) से होती है, जो वन विभाग में फॉरेस्ट इन-चार्ज के पद पर कार्यरत हैं। फिल्म के शुरुआती दृश्यों में ही प्रजापति को एक आदमखोर तेंदुआ पकड़ते हुए दिखाया गया है, जो उनके साहसी व्यक्तित्व और इलाके में उनके दबदबे को बखूबी दर्शाता है। घर पर उनकी वैवाहिक जिंदगी अपनी पत्रकार पत्नी अपर्णा (वामिका गब्बी) के साथ काफी खुशहाल और पटरी पर चल रही होती है। वहीं, उनकी सबसे अच्छी सहेली नीलोफर (रकुल प्रीत सिंह) भी उनके साथ वन विभाग में ही काम करती है।
कहानी में असली रोमांच और ट्विस्ट तब आता है जब प्रजापति की पुरानी क्लासमेट चंचल (सारा अली खान) की अचानक एंट्री होती है। चंचल एक बेहद गंभीर पारिवारिक संकट में फंसी हुई है और उसे अपने बॉयफ्रेंड सनी के साथ विदेश भागने के लिए सिर्फ एक हफ्ते का वक्त चाहिए। सनी के पिता गजराज (तिग्मांशु धूलिया) शहर के एक रसूखदार और बाहुबली राजनेता हैं, जो इस प्रेम संबंध के सख्त खिलाफ हैं। अब अपनी पुरानी दोस्त को इस मुसीबत से बाहर निकालने के चक्कर में प्रजापति एक ऐसा अनजाने में झूठ बोल देते हैं, जो उनकी खुद की व्यवस्थित जिंदगी का ‘रायता’ फैला देता है। वह चंचल का नकली पति बनने का नाटक करने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन यह छोटा सा नाटक कब एक बड़े नेशनल कन्फ्यूजन में तब्दील हो जाता है, यही फिल्म का मुख्य आकर्षण है।
समीक्षा के लिहाज से बात करें तो ‘पति पत्नी और वो 2‘ एक ऐसी फिल्म है जो अपनी ‘लॉजिक-लेस’ यानी बिना तर्क वाली स्लैपस्टिक कॉमेडी को लेकर बिल्कुल भी झिझकती नहीं है। यह निर्देशक मुदस्सर अजीज की अपनी एक अलग कॉमिक दुनिया है, जहां किरदार आपस में सामान्य बात नहीं करते, बल्कि हर संवाद चिल्लाकर बोलते हैं। आयुष्मान खुराना अभिनीत यह फिल्म लगभग 1 घंटा 57 मिनट की है, जो किसी उबड़-खाबड़ और शोर-शराबे से भरे रंग-बिरंगे मेले की सवारी जैसी महसूस होती है।
फिल्म का पहला हाफ सभी किरदारों को स्थापित करने और उनके बीच गलतफहमियों की मजबूत नींव रखने में निकल जाता है। लेकिन असली मजा दूसरे हाफ में शुरू होता है, जब कन्फ्यूजन अपने चरम स्तर पर पहुंच जाता है। यहां आयुष्मान का किरदार खुद को एक ऐसी अजीबोगरीब स्थिति में पाता है जहां लोग उसे ‘बाईसेक्सुअल’ तक समझने लगते हैं। फिल्म की कहानी में एक आदमखोर भेड़िया भी शामिल किया गया है और वन विभाग का एक ऐसा अनोखा ऑफिस बॉय भी है जो सदाबहार फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ की अनारकली के शायराना अंदाज में बातें करता है। यह सब सुनने में भले ही थोड़ा अजीब और अतार्किक लगे, लेकिन सिनेमाघर के भीतर यह पागलपन कई जगहों पर दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देता है।
फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अजीज का काम पूरी तरह से ‘मैक्सिमलिज्म’ यानी चीजों को बेहद लाउड और बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की शैली पर आधारित है। उन्होंने फिल्म के माहौल को बहुत ज्यादा लाउड रखा है, जो इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी भी बनती है और कहीं-कहीं इसकी सबसे कमजोर कड़ी भी साबित होती है। कुछ दृश्यों में ऐसा महसूस होता है कि जोक्स को जरूरत से ज्यादा खींचा गया है और फिल्म की एडिटिंग को थोड़ा और क्रिस्प (चुस्त) बनाया जा सकता था।
हालांकि, फिल्म के चुटीले डायलॉग्स में उत्तर प्रदेश का देसी तड़का और प्रयागराज की बोली का स्थानीय फ्लेवर साफ तौर पर झलकता है, जो दर्शकों को बांधे रखता है। तकनीकी रूप से फिल्म का स्तर काफी बेहतर है। सबसे अच्छी बात यह है कि वन विभाग के दृश्यों में इस्तेमाल किए गए जानवर (तेंदुआ और भेड़िया) घटिया या नकली CGI जैसे नहीं लगते, जिससे फिल्म की विजुअल अपील काफी शानदार हो जाती है। फिल्म के गाने और डांस नंबरों को पुराने बॉलीवुड के क्लासिक अंदाज में कोरियोग्राफ किया गया है, जो मुख्यधारा के ‘मासी’ दर्शकों को बेहद पसंद आएंगे।
अभिनय के मोर्चे पर सभी कलाकारों ने सराहनीय प्रदर्शन किया है:
आयुष्मान खुराना: अपनी पिछली फिल्म ‘थम्मा’ की सफलता के बाद आयुष्मान एक बार फिर अपने चिर-परिचित होम ग्राउंड यानी छोटे शहर के सीधे-साधे किरदार के रूप में लौटे हैं। एक बेबस, लाचार और अपनी ही बुनी हुई उलझनों के जाल में फंसे मिडिल क्लास आदमी के रोल में वह हमेशा की तरह लाजवाब और बेहद सहज दिखे हैं। स्लैपस्टिक कॉमेडी और रोने-धोने वाले दृश्यों में उनकी कॉमिक टाइमिंग कमाल की है।
वामिका गब्बी: हॉरर-कॉमेडी फिल्म ‘भूत बंगला’ के बाद यहां वामिका गब्बी को अपनी अभिनय प्रतिभा दिखाने का एक बेहतरीन और बड़ा मौका मिला है। एक बेहद प्यार करने वाली और फिर सच सामने आने पर गुस्से से तमतमाई हुई पत्नी के रूप में उन्होंने बहुत ही स्वाभाविक और दमदार अभिनय किया है।
रकुल प्रीत सिंह और सारा अली खान: रकुल प्रीत सिंह का किरदार इस पूरी उथल-पुथल के बीच फंसा हुआ नजर आता है और उन्होंने अपने हिस्से की संजीदगी को पर्दे पर बखूबी उतारा है। वहीं, दूसरी तरफ सारा अली खान के ‘ओवर-द-टॉप’ एक्टिंग करने की क्षमता का निर्देशक ने चंचल के चुलबुले किरदार के लिए बहुत ही चतुराई से इस्तेमाल किया है, जिसमें वह पूरी तरह फिट बैठती हैं।
सपोर्टिंग कास्ट: इस फिल्म की असली रीढ़ इसकी सहायक स्टारकास्ट है। बुआ जी के किरदार में नजर आईं आयशा रजा ने अपनी बेबाक बक-बक और लाजवाब कॉमिक टाइमिंग से पूरी महफिल लूट ली है। उनके अलावा विजय राज, तिग्मांशु धूलिया और विशाल वशिष्ठ ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ शत-प्रतिशत न्याय किया है।
बॉक्स ऑफिस के नजरिए से सीधा सा गणित यह है कि यदि आप इस वीकेंड पर किसी भारी-भरकम सस्पेंस, थ्रिलर या दिमाग घुमाने वाली गंभीर फिल्मों से थोड़ा ब्रेक लेना चाहते हैं, तो ‘पति पत्नी और वो 2’ आपके लिए एक बेहतरीन और फुल-पैसा वसूल टाइमपास मनोरंजन साबित हो सकती है। इस फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट इसके कलाकारों का लाजवाब अभिनय और सटीक कॉमिक टाइमिंग है, जो आपको थिएटर में बोर नहीं होने देती। फिल्म की लंबाई भी दो घंटे से कम है, इसलिए यह काफी तेजी से आगे बढ़ती है।
हालांकि, दर्शकों को यह ध्यान रखना होगा कि फिल्म काफी लाउड है, जिसमें शोर-शराबा और चिल्लम-चिल्ली थोड़ी ज्यादा है। कुछ दृश्यों में जोक्स काफी खिंचे हुए लगते हैं और इसमें लॉजिक (तर्क) की उम्मीद तो आप बिलकुल न करें। साथ ही, फिल्म में एक समलैंगिक (गे) किरदार को पुराने घिसे-पिटे और रूढ़िवादी अंदाज में पेश किया गया है, जो आधुनिक सिनेमा के हिसाब से थोड़ा खलता है। फिर भी, अगर आप हर तरह के लॉजिक को ताक पर रखकर बिना किसी तनाव के सिर्फ ठहाके लगाना चाहते हैं, तो आयुष्मान खुराना की यह ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’ आपके वीकेंड को खुशनुमा बनाने के लिए एक अच्छा और मनोरंजक विकल्प है। यह फिल्म पूरी तरह से ‘दिमाग लगाओगे तो थक जाओगे, दिल लगाओगे तो हंसते रह जाओगे’ वाले पुराने और सफल बॉलीवुड फॉर्मूले पर चलती है।
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