Raigarh Coal Mine: छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में गारे पेलमा सेक्टर-1 कोल ब्लॉक के लिए प्रस्तावित जनसुनवाई का मामला अब एक बड़े मोड़ पर पहुंच गया है। जिंदल पावर लिमिटेड (JPL) के लिए प्रस्तावित इस खदान के खिलाफ ग्रामीणों के उग्र आंदोलन और हालिया हिंसक झड़पों के बाद कंपनी ने हार मान ली है। 29 दिसंबर को कंपनी ने प्रशासन को एक पत्र लिखकर जनसुनवाई के लिए किए गए अपने आवेदन को वापस लेने की मांग की है। घरघोड़ा एसडीएम दुर्गा प्रसाद ने भी पुष्टि की है कि प्रशासन की ओर से जनसुनवाई निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यह ग्रामीणों की एकता और लंबे संघर्ष की एक बड़ी जीत मानी जा रही है।
Raigarh Coal Mine: प्रभावित हो रहे थे 14 गांव: 3100 हेक्टेयर जमीन का था प्रस्ताव
गारे पेलमा सेक्टर-1 के इस कोल ब्लॉक से क्षेत्र के कुल 14 गांव सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे थे। यदि जनसुनवाई सफल हो जाती और परियोजना आगे बढ़ती, तो कंपनी इन गांवों की लगभग 3100 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण करती। प्रभावित होने वाले गांवों में धौराभांठा, लिबरा, झिकाबहाल, बागबाड़ी, बुड़िया, समकेरा, झरना, खुरूसलेंगा, लमडांड, बिजना, टांगरघाट, आमगांव, रावनगुड़ार और तिलाईपारा शामिल थे। कंपनी ने मुआवजे के तौर पर प्रति एकड़ 62 लाख रुपये देने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन ग्रामीणों ने अपनी जमीन और आजीविका को पैसों से ऊपर रखते हुए इस सौदे को सिरे से खारिज कर दिया।
Raigarh Coal Mine: संघर्ष की कहानी: सड़कों पर बीती रातें और पुलिसिया कार्रवाई
ग्रामीणों का यह आंदोलन कोई नया नहीं है। इससे पहले 14 अक्टूबर को निर्धारित जनसुनवाई को निरस्त कराने के लिए ग्रामीणों ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर ज्ञापन सौंपा था और कड़ाके की ठंड में रातें सड़कों पर बिताई थीं। इसके बाद 8 दिसंबर को धौराभांठा स्कूल मैदान में दोबारा जनसुनवाई आयोजित की गई, जिसे ग्रामीणों ने ‘फर्जी’ करार देते हुए भारी विरोध किया था। विवाद तब और बढ़ गया जब 27 दिसंबर को लिबरा के सीएचपी चौक पर प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई। इस घटना ने पूरे प्रदेश का ध्यान रायगढ़ की ओर खींच लिया।
पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज का हमला: पुलिस प्रशासन को ठहराया जिम्मेदार
ग्रामीणों के प्रदर्शन को समर्थन देने और वस्तुस्थिति का जायजा लेने के लिए प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज 29 दिसंबर को धरना स्थल पहुंचे। बैज ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ग्रामीण शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे थे, लेकिन पुलिस ने जानबूझकर उन्हें उकसाया। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बर्बरता दिखाते हुए धरना स्थल से 40 से अधिक महिलाओं और पुरुषों को जबरन गिरफ्तार किया, जिससे स्थिति अनियंत्रित हुई। बैज ने इस पूरी हिंसा और अशांति के लिए सीधे तौर पर स्थानीय पुलिस प्रशासन और सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया।
मुआवजे और विस्थापन पर भारी पड़ी ‘माटी की ममता’
62 लाख रुपये प्रति एकड़ का भारी-भरकम मुआवजा भी ग्रामीणों के इरादों को डिगा नहीं सका। ग्रामीणों का तर्क है कि जमीन केवल आय का साधन नहीं, बल्कि उनकी पहचान और संस्कृति का हिस्सा है। इस आंदोलन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बिना स्थानीय सहमति के बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को धरातल पर उतारना अब मुमकिन नहीं है। फिलहाल प्रशासन ने जनसुनवाई स्थगित कर दी है, लेकिन क्षेत्र में तनाव को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात है और ग्रामीण अपनी जीत के बावजूद सतर्क बने हुए हैं।
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