Ramadan 2026 : इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं और आज यानी बुधवार को आसमान में रमजान का पाक चांद नजर आ गया है। चांद के दीदार के साथ ही पूरी दुनिया और देश भर में इस्लाम के सबसे पवित्र महीने ‘रमजान’ का आधिकारिक आगाज हो गया है। मुस्लिम समुदाय के लिए यह महीना इबादत, सब्र और रूहानी सुकून का पैगाम लेकर आता है। जैसे ही चांद दिखने की तस्दीक हुई, मस्जिदों और घरों में खुशियां छा गईं और मुबारकबाद देने का सिलसिला शुरू हो गया। कल से ही रोजेदार अपना पहला रोजा रखेंगे और अल्लाह की इबादत में मशगूल हो जाएंगे। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, यह साल का नौवां महीना होता है, जिसे रहमतों और बरकतों का महीना कहा जाता है।

कुरान का नुजूल और रमजान की पवित्रता
इस्लामिक मान्यताओं और इतिहास के मुताबिक, रमजान का महीना इसलिए सबसे पाक माना जाता है क्योंकि इसी महीने के दौरान अल्लाह ने पैगंबर मोहम्मद साहब पर अपनी पाक किताब ‘कुरान’ की आयतें नाजिल की थीं। यानी इसी महीने कुरान दुनिया के सामने आया। यही वजह है कि मुसलमान इस पूरे महीने में कुरान की तिलावत (पढ़ना) को विशेष महत्व देते हैं। मान्यता है कि इस महीने में की गई इबादत का सबाब (पुण्य) अन्य महीनों के मुकाबले कई गुना बढ़ जाता है। यह महीना इंसान को आत्म-नियंत्रण, अनुशासन और खुदा के प्रति पूर्ण समर्पण सिखाता है।
इस्लाम में रोजे का रूहानी और सामाजिक महत्व
रोजा रखना इस्लाम के पांच बुनियादी स्तंभों में से एक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो मुसलमान रमजान के दौरान पूरी शिद्दत और ईमानदारी के साथ रोजा रखता है, अल्लाह उससे बेहद खुश होते हैं और उसकी हर जायज दुआ कुबूल फरमाते हैं। रोजा केवल भूखा या प्यासा रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह रूह की पाकीजगी का जरिया है। रोजा रखने का मुख्य उद्देश्य इंसान के भीतर परहेजगारी पैदा करना और उसे उन लोगों की तकलीफों का एहसास कराना है, जो गरीबी के कारण भूखे-प्यासे रहते हैं। यह समाज में भाईचारे और दान-पुण्य (जकात और सदका) की भावना को बढ़ाता है।
सहरी और इफ्तार: रोजे के सख्त नियम और परंपराएं
रोजे की शुरुआत सूरज निकलने से पहले होती है। भोर के समय जो खाना खाया जाता है, उसे ‘सहरी’ कहा जाता है। सहरी करने के बाद पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करना पड़ता है। शाम को सूरज ढलने के बाद जब रोजा खोला जाता है, तो उस समय के भोजन और आयोजन को ‘इफ्तार’ कहते हैं। आमतौर पर खजूर खाकर रोजा खोलने की सुन्नत है। रोजे के दौरान न केवल खाने-पीने से परहेज करना होता है, बल्कि अपनी पांचों इंद्रियों पर भी काबू रखना जरूरी है। रोजेदार को झूठ बोलने, बुराई सुनने, गलत देखने और किसी की गीबत (पीठ पीछे बुराई) करने से बचना चाहिए।
इबादत और दुआओं का खास महीना
रमजान के दौरान विशेष नमाज ‘तरावीह’ का भी आयोजन किया जाता है, जिसमें रात के वक्त मस्जिदों में कुरान सुना जाता है। रोजा रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी जुबान और व्यवहार से किसी का दिल न दुखाए। इस पाक महीने में रोजेदार अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त अल्लाह के जिक्र और दुआओं में बिताते हैं। यह महीना इंसान को अपनी गलतियों की माफी मांगने और नेक रास्ते पर चलने का मौका देता है।


















