Rambhadracharya on Owaisi
Rambhadracharya on Owaisi: प्रसिद्ध कथावाचक और प्रज्ञाचक्षु जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के उस विवादास्पद बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने एक हिजाब पहनने वाली महिला के प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी की थी। जयपुर प्रवास के दौरान पत्रकारों से चर्चा करते हुए रामभद्राचार्य ने ओवैसी के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ओवैसी जो देख रहे हैं, वह केवल एक ‘दिवास्वप्न’ (दिन में देखा गया सपना) है। जगद्गुरु ने भारतीय संस्कृति और परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि यदि भविष्य में कोई महिला भारत के शीर्ष पद पर आसीन होती है, तो वह भारतीय वेशभूषा यानी साड़ी पहनने वाली महिला होगी।
रामभद्राचार्य ने ओवैसी के बयान की आलोचना करते हुए इसे समाज में भ्रम फैलाने वाला और दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि भारत का लोकतंत्र हमेशा से समावेशी रहा है और यहाँ योग्यता के आधार पर हर समुदाय को सम्मान मिला है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “देश ने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार किया और हामिद अंसारी भी उपराष्ट्रपति के पद तक पहुँचे। आखिर ओवैसी और उनके समुदाय को और क्या चाहिए?” उन्होंने ओवैसी को इस तरह के सांप्रदायिक या तुष्टिकरण की राजनीति से प्रेरित बयानों से बचने की सलाह दी।
जगद्गुरु रामभद्राचार्य अपने बेबाक और अक्सर राजनीतिक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की पहचान इसकी सनातन संस्कृति और परंपराओं से है। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री जैसा गरिमामय पद भारतीयता का प्रतीक होना चाहिए। जयपुर में दिए गए उनके इस बयान ने अब एक नई बहस छेड़ दी है, जहाँ एक तरफ संवैधानिक स्वतंत्रता की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ सांस्कृतिक पहचान की। रामभद्राचार्य के इस बयान को ओवैसी के ‘हिजाब’ वाले विजन के सांस्कृतिक विरोध के रूप में देखा जा रहा है।
इस पूरे विवाद की जड़ ओवैसी का वह भाषण है जो उन्होंने महाराष्ट्र के सोलापुर में एक चुनावी रैली के दौरान दिया था। ओवैसी ने भारतीय संविधान की तुलना पाकिस्तान के संविधान से करते हुए कहा था कि पाकिस्तान में संवैधानिक पदों के लिए धार्मिक पाबंदियां हैं, लेकिन बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के संविधान ने हर नागरिक को बराबरी का हक दिया है। ओवैसी ने कहा था, “मेरा सपना है कि एक दिन इस देश की प्रधानमंत्री हिजाब पहनने वाली एक बेटी बने।” ओवैसी का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद हिंदू संगठनों और अब धर्मगुरुओं की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।
हालांकि अभी तक इस मुद्दे पर प्रमुख विपक्षी दलों या सत्ताधारी दल के केंद्रीय नेतृत्व की औपचारिक प्रतिक्रिया विस्तृत रूप से नहीं आई है, लेकिन रामभद्राचार्य जैसे प्रभावशाली व्यक्तित्व के हस्तक्षेप के बाद यह मामला तूल पकड़ता नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी का बयान ध्रुवीकरण की कोशिश हो सकता है, जबकि रामभद्राचार्य की टिप्पणी बहुसंख्यक आबादी की सांस्कृतिक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। राजस्थान की राजधानी जयपुर से शुरू हुई यह बयानबाजी अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है।
यह पूरा विवाद एक बार फिर संविधान प्रदत्त अधिकारों और देश की सांस्कृतिक विरासत के बीच की लकीर को धुंधला कर रहा है। जहाँ ओवैसी संविधान के ‘समान अवसर’ वाले पहलू को ढाल बना रहे हैं, वहीं जगद्गुरु रामभद्राचार्य इसे देश की मूल पहचान और सभ्यता से जोड़कर देख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अन्य धार्मिक और राजनीतिक संगठन इस बहस में कूदते हैं या यह केवल एक शाब्दिक युद्ध तक ही सीमित रहता है। फिलहाल, जयपुर से लेकर सोलापुर तक इस बयानबाजी ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है।
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