RG Kar case
RG Kar case : पश्चिम बंगाल के पानीहाटी विधानसभा क्षेत्र में इस बार का चुनाव सामान्य राजनीतिक लड़ाई से कहीं ऊपर है। वार्ड नंबर 12 के भाजपा कार्यालय में जब सफेद सूती साड़ी और काले बॉर्डर वाली पोशाक में रत्ना देबनाथ प्रवेश करती हैं, तो माहौल भावुक हो जाता है। उनकी साड़ी पर बंगाली में अंकित शब्द—”मैंने अपनी रीढ़ नहीं बेची है”—उनके अडिग साहस का प्रतीक हैं। देश उन्हें अब ‘अभया की मां’ के रूप में जानता है। 9 अगस्त 2024 को आरजी कर मेडिकल कॉलेज में अपनी डॉक्टर बेटी को खोने वाली रत्ना अब अपनी बेटी के संघर्ष को चुनावी रण में न्याय की हुंकार बना रही हैं।
रत्ना देबनाथ को इस कठिन लड़ाई की प्रेरणा अपनी बेटी से मिलती है, जिसने अंतिम सांस तक संघर्ष किया। जूनियर डॉक्टर बेटी की हत्या के बाद उपजे जनाक्रोश और ममता सरकार पर लगे ‘लीपापोती’ के आरोपों ने इस मामले को सीबीआई तक पहुँचाया। रत्ना का कहना है कि उन्होंने भाजपा का दामन इसलिए थामा क्योंकि टीएमसी के कुशासन के खिलाफ लड़ने का यही एकमात्र प्रभावी विकल्प था। उनका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य की कोई भी अन्य महिला असुरक्षित महसूस न करे।
चुनाव प्रचार के दौरान पानीहाटी की संकरी गलियों में ‘वी वांट जस्टिस’ के नारे फिर से जीवित हो उठे हैं। महिलाएं रत्ना को गले लगाकर सांत्वना दे रही हैं। एक मतदाता ने भावुक होकर कहा कि उनकी बेटी भी बाहर काम करती है, इसलिए वे एक मां का दर्द समझ सकती हैं। भाजपा की एससी मोर्चा अध्यक्ष संगीता पाल इसे राजनीतिक अभियान के बजाय टीएमसी के खिलाफ एक सामाजिक युद्ध मानती हैं, जहाँ जनता का समर्थन ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने पांच बार के विधायक निर्मल घोष के बेटे तीर्थंकर घोष को मैदान में उतारा है। तीर्थंकर का कहना है कि वे व्यक्तिगत रूप से रत्ना देबनाथ (काकीमां) का सम्मान करते हैं, लेकिन भाजपा की विचारधारा का विरोध करते हैं। वे बंगाल को महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित राज्य बताते हुए ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं का हवाला दे रहे हैं। टीएमसी समर्थक महिलाओं का मानना है कि ‘दीदी’ ने उनके जीवन को सरल बनाया है, और वे न्याय की मांग का समर्थन तो करती हैं, लेकिन राजनीतिक झंडे के नीचे नहीं।
इस चुनावी जंग में माकपा के युवा नेता कलातन दासगुप्ता ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। दासगुप्ता, जिन्हें आरजी कर विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किया गया था, टीएमसी और भाजपा दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू बताते हैं। उनका तर्क है कि पार्क स्ट्रीट से लेकर आरजी कर तक और हाथरस से लेकर कठुआ तक, दोनों पार्टियों का चरित्र एक जैसा है। वे इसे केवल सत्ता की नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक लड़ाई मान रहे हैं।
पानीहाटी में अब मुकाबला भावनात्मक न्याय, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और वैचारिक प्रतिबद्धता के बीच सिमट गया है। 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में यह स्पष्ट होगा कि क्या एक मां का संघर्ष सत्ता परिवर्तन ला पाएगा या कल्याणकारी योजनाओं का जादू बरकरार रहेगा।
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