Rohingya issue Supreme Court:
Rohingya issue Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देश में रह रहे रोहिंग्याओं की कानूनी हैसियत पर गंभीर सवाल उठाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जयमाल्या बागची की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि जब देश के अपने लाखों गरीब नागरिक भुखमरी और बदहाली का शिकार हैं, तो क्या ‘घुसपैठियों का लाल कालीन बिछाकर स्वागत’ किया जाना चाहिए? अदालत मानवाधिकार कार्यकर्ता रीता मांचंदा की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मई में दिल्ली पुलिस द्वारा पकड़े गए कुछ रोहिंग्याओं के ठिकाने का अब कोई पता नहीं चल रहा है।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने तल्ख लहजे का इस्तेमाल किया और रोहिंग्याओं के भारत में रहने के कानूनी अधिकार पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “अगर उनके पास भारत में रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है और वे घुसपैठिए हैं तो क्या हम लाल कालीन बिछाकर उनका स्वागत करें कि आइए, हम आपको सारी सुविधाएं देंगे?”
चीफ जस्टिस ने घुसपैठ की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए: “पहले आप अवैध तरीके से सीमा पार करते हैं। सुरंग खोदकर या तार काटकर भारत में घुसते हैं। फिर कहते हैं कि अब मैं आ गया हूं, तो अब भारत के कानून मेरे ऊपर लागू हों, मुझे खाना दो, रहने की जगह दो, मेरे बच्चों को पढ़ाई दो। क्या हम कानून को इस हद तक लचीला बना दें?” यह टिप्पणी भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
अदालत ने देश के गरीब नागरिकों का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि पहले सुविधाओं और लाभों पर भारतीय नागरिकों का हक है। चीफ जस्टिस ने कहा, “हमारे देश में अपने लाखों गरीब लोग हैं। वे नागरिक हैं। क्या उन्हें सुविधाएं और लाभ नहीं मिलने चाहिए? पहले उन पर ध्यान दो।” हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अवैध घुसपैठिए भी हों, तो उन्हें ‘थर्ड डिग्री टॉर्चर नहीं करना चाहिए’, लेकिन याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई हैबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) की मांग पर चिंता जताई। बेंच ने कहा कि अगर उन्हें वापस लाकर दोबारा छोड़ने की बात होगी तो लॉजिस्टिकल दिक्कतें आएंगी। याचिकाकर्ता के वकील ने 2020 के एक पुराने आदेश का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि रोहिंग्याओं को सिर्फ कानूनी प्रक्रिया के तहत ही डिपोर्ट किया जाए।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि यह याचिका प्रभावित व्यक्ति ने नहीं, बल्कि किसी तीसरे पक्ष ने दाखिल की है, इसलिए याचिकाकर्ता का कोई लोकस (मामला दायर करने का कानूनी हक) नहीं बनता।
कोर्ट ने रोहिंग्या से जुड़े सारे मामलों को 3 हिस्सों में बांट दिया है और घोषणा की है कि प्रत्येक बुधवार को इन पर अलग-अलग सुनवाई होगी। कोर्ट द्वारा उठाए गए मुख्य सवाल इस प्रकार हैं:
क्या रोहिंग्या शरणार्थी (रिफ्यूजी) हैं या अवैध घुसपैठिए?
अगर शरणार्थी हैं तो उन्हें क्या अधिकार और सुविधाएं मिलनी चाहिए?
अगर अवैध घुसपैठिए हैं तो केंद्र और राज्यों का उन्हें डिपोर्ट करना सही है या नहीं?
क्या उन्हें अनिश्चित काल तक हिरासत में रखा जा सकता है या जमानत पर छोड़ा जाए?
जो कैंपों में रह रहे हैं, उन्हें बुनियादी सुविधाएं (पीने का पानी, शौचालय, शिक्षा) मिलनी चाहिए या नहीं?
कोर्ट ने पहले भी साफ किया है कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) का कार्ड भारत के कानून में कोई वैध दस्तावेज नहीं माना जाता। इस मामले की अगली सुनवाई अब 16 दिसंबर को होगी।
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