Dollar vs Rupee 2026
Dollar vs Rupee 2026 : ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारतीय मुद्रा को भी गहरे संकट में डाल दिया है। सोमवार को भारतीय रुपया इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया, जब इसने पहली बार प्रति डॉलर 95 का आंकड़ा पार किया। हालांकि, दिन के अंत में इसमें कुछ सुधार हुआ और यह 94.70 पर बंद हुआ, लेकिन पूरे दिन बाजार में हाहाकार मचा रहा। वित्त वर्ष 2025-26 रुपये के लिए पिछले 14 वर्षों में सबसे चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है, जिसमें इसमें 9.88% की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस आपातकालीन स्थिति को देखते हुए देश के सबसे बड़े बैंक, एसबीआई (SBI) की एक इकॉनोमिक रिसर्च रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें रिजर्व बैंक को तुरंत दखल देने की सलाह दी गई है।
एसबीआई की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि भारत के पास वर्तमान में 700 अरब डॉलर से अधिक का विशाल विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) मौजूद है। यह भंडार इतना सक्षम है कि भारत बिना किसी अतिरिक्त आय के 10 महीने से अधिक का आयात बिल चुका सकता है। एसबीआई का तर्क है कि इस संचित धन को केवल ‘बुरे दिनों’ के लिए बचाकर रखने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि आज रुपये की स्थिति ही सबसे बुरा दौर है। आरबीआई को इस भंडार का एक हिस्सा बाजार में उतारना चाहिए ताकि डॉलर की तरलता बढ़े और रुपये की गिरावट पर लगाम लग सके।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है, जिसके लिए तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को प्रतिदिन बाजार से लगभग 250-300 मिलियन डॉलर खरीदने पड़ते हैं। इतनी बड़ी मांग बाजार में डॉलर की किल्लत पैदा करती है। एसबीआई ने सुझाव दिया है कि आरबीआई को इन कंपनियों के लिए एक अलग ‘स्पेशल विंडो’ खोलनी चाहिए। इससे तेल कंपनियों की डॉलर की मांग मुख्य बाजार से हट जाएगी, जिससे आम बाजार में डॉलर पर दबाव कम होगा और रुपया संभल पाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार, रुपये की गिरावट के पीछे केवल आर्थिक कारण नहीं, बल्कि बाजार में सक्रिय सट्टेबाज भी हैं। एसबीआई का मानना है कि आरबीआई का बाजार में हस्तक्षेप करना इन सट्टेबाजों को डराने के लिए पर्याप्त होगा। इसके अतिरिक्त, एसबीआई ने आरबीआई द्वारा बैंकों के लिए तय की गई 100 मिलियन डॉलर की ‘नेट ओपन पोजीशन’ (NOP) लिमिट पर भी सवाल उठाए हैं। बैंक का कहना है कि यह नियम पूरे बैंक के बजाय केवल ट्रेडिंग गतिविधियों पर लागू होना चाहिए, अन्यथा विदेशी निवेशकों (FPIs) के लिए ऑपरेशनल मुश्किलें पैदा हो सकती हैं और वे अपना निवेश तेजी से बाहर निकाल सकते हैं।
पश्चिम एशिया के संकट ने न केवल घरेलू बल्कि विदेशी बाजारों (Offshore Market) में भी रुपये की साख को प्रभावित किया है। एक साल का प्रीमियम 3.43% से बढ़कर 4.19% हो गया है, जो बाजार में नकदी (Liquidity) की भारी कमी का संकेत है। विदेशी फंड्स की निकासी, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ ने आग में घी डालने का काम किया है।
भारतीय रुपया 2011-12 के बाद के अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहा है। एसबीआई की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है। 31 मार्च 2026 की इस रिपोर्ट के अनुसार, अब गेंद रिजर्व बैंक के पाले में है कि वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार के ‘कवच’ का इस्तेमाल रुपये की ‘रीढ़’ बचाने के लिए कैसे करता है।
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