Sarguja Drug Racket: छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में मादक पदार्थों की अवैध तस्करी और युवाओं को नशे की गर्त में धकेलने वालों के खिलाफ कानून का कड़ा चाबुक चला है। सरगुजा के विशेष न्यायालय (एनडीपीएस एक्ट) ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘दर्श मेडिकल स्टोर’ के संचालक देवेश जायसवाल को नशीली दवाओं के अवैध भंडारण और बिक्री का दोषी पाया है। विशेष न्यायाधीश अतुल कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने आरोपी को 15 वर्ष के कठोर कारावास और भारी आर्थिक दंड की सजा सुनाई है। इस फैसले ने जिले के दवा व्यापारियों और अवैध नशा कारोबारियों के बीच एक सख्त संदेश भेजा है कि पेशेवर मर्यादा का उल्लंघन कर युवाओं का भविष्य बर्बाद करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

छापेमारी की कार्रवाई: मुखबिर की सूचना पर पुलिस और औषधि विभाग का शिकंजा
मामले की जड़ें 23 फरवरी 2024 की उस घटना से जुड़ी हैं, जब अंबिकापुर पुलिस को जनपदपारा स्थित एक मेडिकल स्टोर में प्रतिबंधित दवाओं के अवैध कारोबार की गुप्त सूचना मिली थी। उप निरीक्षक सुनीता भारद्वाज को मुखबिर ने बताया कि दर्श मेडिकल स्टोर का संचालक देवेश जायसवाल नशीले इंजेक्शन और टेबलेट्स का भंडारण कर उन्हें स्थानीय युवाओं को ऊंचे दामों पर बेच रहा है। सूचना की गंभीरता को देखते हुए नगर पुलिस अधीक्षक और औषधि निरीक्षकों की एक संयुक्त टीम गठित की गई। टीम ने मेडिकल स्टोर और संचालक के रिहायशी मकान पर एक साथ दबिश दी, जिससे आरोपी को संभलने का मौका नहीं मिला।
भारी मात्रा में प्रतिबंधित दवाइयां बरामद: लैब परीक्षण में हुआ बड़ा खुलासा
दबिश के दौरान जब स्टोर रूम और घर की तलाशी ली गई, तो अधिकारियों के होश उड़ गए। वहां से भारी मात्रा में नशीले इंजेक्शन और प्रतिबंधित टेबलेट्स बरामद किए गए। पुलिस ने मौके से ‘Buprenorphine Hydrochloride’ के 130 नग इंजेक्शन (260 एमएल) और ‘Alprazolam’ युक्त 318 टेबलेट्स (कुल वजन 193.9 ग्राम) जब्त किए। इन दवाओं के नमूनों को तुरंत सीलबंद कर रासायनिक परीक्षण के लिए अंबिकापुर स्थित क्षेत्रीय न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया। लैब रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि इन दवाओं में उच्च स्तर के मनःप्रभावी (Psychotropic) पदार्थ मौजूद थे। जांच में यह भी पाया गया कि दवाओं के बैच नंबर जानबूझकर मिटाए गए थे ताकि उनकी आपूर्ति का स्रोत न पता चल सके।
अदालत की सख्त टिप्पणी: समाज पर पड़ता है दवाओं के दुरुपयोग का बुरा असर
मामले की सुनवाई के दौरान विशेष न्यायाधीश अतुल कुमार श्रीवास्तव ने अभियोजन पक्ष के तर्कों को गंभीरता से सुना। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि एक लाइसेंसधारी मेडिकल स्टोर संचालक का यह परम कर्तव्य है कि वह दवाओं की बिक्री नियमों के अनुसार करे। देवेश जायसवाल द्वारा नशीली दवाओं का अवैध भंडारण न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि समाज, विशेषकर युवा पीढ़ी के स्वास्थ्य के साथ किया गया एक जघन्य अपराध है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी देवेश के विरुद्ध आरोपों को बिना किसी संदेह के सिद्ध करने में पूरी तरह सफल रहा है, जिसके आधार पर उसे कड़ी सजा दी जानी आवश्यक है।
सजा का विवरण: 15 साल की कैद और 1.50 लाख रुपये का जुर्माना
दोषसिद्धि के उपरांत न्यायालय ने देवेश जायसवाल को एनडीपीएस एक्ट की धारा 22 (सी) के तहत 15 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। साथ ही, उस पर 1,50,000 रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। यदि दोषी जुर्माना अदा करने में विफल रहता है, तो उसे एक वर्ष का अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगतना होगा। वहीं, इस मामले में आरोपी की पत्नी ज्योति जायसवाल को भी सह-आरोपी बनाया गया था, लेकिन अदालत ने उन्हें संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए और साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त कर बरी कर दिया।
नशा मुक्ति अभियान को मिलेगा बल: पुलिस प्रशासन की बड़ी उपलब्धि
सरगुजा पुलिस और विशेष न्यायालय के इस फैसले की शहर में काफी चर्चा हो रही है। नशे के खिलाफ जारी ‘निजात’ जैसे अभियानों के बीच इस तरह की सख्त सजा से पुलिस का मनोबल बढ़ा है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि जब तक नशीली दवाओं की आपूर्ति करने वाले मुख्य केंद्रों (जैसे मेडिकल स्टोर) पर ऐसी कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक नशे की समस्या पर पूरी तरह लगाम लगाना मुश्किल है। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में भी ऐसे दवा संचालकों पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी जो नियम विरुद्ध कार्य कर रहे हैं।
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