Iran-US War
Iran-US War : अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़ी गई जंग के बीच खाड़ी देशों (Gulf Countries) के रुख में एक नाटकीय और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है। युद्ध की शुरुआत से पहले, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों ने ट्रंप प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि वे ईरान के साथ सीधे सैन्य संघर्ष की राह न चुनें। हालांकि, जैसे-जैसे यह युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है, इन देशों की कूटनीति अब कड़े प्रहार की ओर झुकती नजर आ रही है। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, अब कई खाड़ी देश चाहते हैं कि अमेरिका इस सैन्य अभियान को तब तक जारी रखे, जब तक ईरान की सैन्य कमर पूरी तरह टूट न जाए।
‘टाइम्स ऑफ इजरायल’ ने चार वरिष्ठ खाड़ी अधिकारियों के हवाले से एक चौंकाने वाली रिपोर्ट प्रकाशित की है। रिपोर्ट के मुताबिक, खाड़ी देशों के नेतृत्व में इस बात को लेकर निराशा जरूर है कि युद्ध उम्मीद से अधिक फैल गया है, लेकिन अब उनकी एक साझा इच्छा है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन और कतर जैसे देश चाहते हैं कि इस युद्ध के समापन तक ईरान की सैन्य क्षमता इतनी कमजोर हो जाए कि वह भविष्य में अपने पड़ोसियों के लिए कोई खतरा पैदा न कर सके। इन देशों का मानना है कि आधे-अधूरे समाधान से ईरान और भी अधिक आक्रामक होकर उभरेगा।
युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने अपनी रणनीति बदलते हुए पड़ोसी खाड़ी देशों के नागरिक इलाकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। शुरुआत में इन देशों ने युद्ध का विरोध इसलिए किया था क्योंकि उन्हें अपनी सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता की चिंता थी। ट्रंप प्रशासन ने इन हमलों पर हैरानी जताई, लेकिन खाड़ी देशों के राजनयिकों का कहना था कि उन्हें इस तरह के पलटवार की पूरी उम्मीद थी। ईरान की इस आक्रामकता ने ही खाड़ी देशों को कूटनीतिक समाधान के बजाय अब सैन्य निर्णायकता की ओर धकेल दिया है।
एक वरिष्ठ खाड़ी राजनयिक ने खुलासा किया कि शुरुआत में क्षेत्रीय शक्तियों के बीच यह आम सहमति थी कि कूटनीति ही सुरक्षा बनाए रखने का सबसे बेहतर तरीका है। उन्हें संदेह था कि केवल सैन्य कार्रवाई से ईरान की क्षेत्रीय गतिविधियों (जैसे प्रॉक्सी वॉर) को पूरी तरह नहीं रोका जा सकेगा। लेकिन अमेरिका और इजरायल की सोच इसके विपरीत थी और उन्होंने युद्ध का रास्ता चुना। अब जब युद्ध शुरू हो चुका है, तो खाड़ी देशों का मानना है कि अब पीछे हटने का मतलब ईरान को और अधिक शक्तिशाली और प्रतिशोधी बनाना होगा।
ईरान ने न केवल अमेरिकी ठिकानों और इजरायल पर हमले किए, बल्कि गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) के छह सदस्य देशों को भी अपनी मिसाइलों का निशाना बनाया। ईरान का सोचना था कि इन हमलों से खाड़ी देश डरकर ट्रंप पर युद्धविराम (Ceasefire) के लिए दबाव बनाएंगे। लेकिन पासा उल्टा पड़ गया। खाड़ी देशों ने महसूस किया कि एक हथियारबंद और सक्रिय ईरान उनके अस्तित्व के लिए स्थायी जोखिम है। एक अधिकारी ने स्पष्ट कहा, “ईरान को हथियारों के साथ छोड़ देना रणनीतिक रूप से आत्मघाती होगा।” हालांकि, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि ये देश सीधे युद्ध में उतरेंगे या केवल रसद और खुफिया जानकारी से अमेरिका-इजरायल की मदद करेंगे।
जहाँ अधिकांश खाड़ी देश अब ईरान के खिलाफ सख्त हो रहे हैं, वहीं ओमान ने अपना अलग और तटस्थ रुख बरकरार रखा है। ओमान के विदेश मंत्री बद्र अलबुसैदी का कहना है कि दुश्मनी को जल्द से जल्द खत्म करना ही अमेरिका और ईरान दोनों के हित में है। गौरतलब है कि युद्ध शुरू होने से पहले ओमान ही वह प्रमुख देश था जो वाशिंगटन और तेहरान के बीच गुप्त बातचीत की मध्यस्थता कर रहा था। ओमान की कोशिश अब भी क्षेत्रीय स्थिरता और युद्धविराम की दिशा में बनी हुई है।
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