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SC Tamil Nadu Electoral Roll: मतदाता सूची में ‘तार्किक विसंगति’ का खेल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मची खलबली

SC Tamil Nadu Electoral Roll:  देश की शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision) को लेकर चल रहे विवाद पर ऐतिहासिक निर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतदाता की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है और इसमें किसी भी प्रकार की तकनीकी खामी या पारदर्शिता की कमी स्वीकार्य नहीं होगी। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार और चुनाव आयोग को उन सभी व्यक्तियों की सूची सार्वजनिक करने का आदेश दिया है, जिनके नामों में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ (तार्किक विसंगति) पाई गई है। यह कदम मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने और किसी भी वास्तविक मतदाता को उसके अधिकार से वंचित होने से बचाने के लिए उठाया गया है।

सूची सार्वजनिक करने और दस्तावेज जमा करने के स्पष्ट निर्देश

जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने निर्देश दिया है कि तार्किक विसंगति सूची (Logical Discrepancy List) में शामिल लोगों के नाम संबंधित ग्राम पंचायत भवनों, उप-मंडल के तालुका कार्यालयों और शहरी क्षेत्रों के वार्ड कार्यालयों में अनिवार्य रूप से प्रदर्शित किए जाएं। सूची में विसंगति का संक्षिप्त कारण भी दर्ज करना होगा ताकि मतदाता को पता चले कि उसके नाम पर आपत्ति क्यों है। सूची प्रदर्शित होने के 10 दिनों के भीतर प्रभावित लोग स्वयं या अपने अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से आवश्यक दस्तावेज जमा कर सकेंगे। आपत्तियां दर्ज कराने के लिए सब-डिवीजन स्तर के कार्यालयों को अधिकृत किया गया है।

कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस प्रमुखों को जिम्मेदारी

सीजेआई सूर्यकांत ने इस पूरी प्रक्रिया के दौरान शांति बनाए रखने पर विशेष जोर दिया है। उन्होंने तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) और पुलिस आयुक्तों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति सुनिश्चित करें। कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची पुनरीक्षण एक संवेदनशील प्रक्रिया है, इसलिए पुलिस को यह पक्का करना चाहिए कि कहीं भी कोई अप्रिय घटना न हो और पूरी प्रक्रिया सुचारू और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।

पश्चिम बंगाल की तर्ज पर तमिलनाडु में भी समान नियम लागू

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब उन्होंने पहले ही पश्चिम बंगाल के लिए कुछ समान दिशानिर्देश (Uniform Guidelines) बना दिए हैं, तो उन्हें तमिलनाडु में लागू न करने का कोई कारण नहीं है। बंगाल के मामले में कोर्ट ने 13.6 मिलियन मतदाताओं की सूची प्रकाशित करने का निर्देश दिया था जिनके फॉर्म में गड़बड़ियां थीं। इसी तर्ज पर अब तमिलनाडु में भी वही मानक लागू होंगे। कोर्ट का मानना है कि इससे पूरे देश में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में एकरूपता और पारदर्शिता आएगी।

डीएमके की याचिका: ‘संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन’ है SIR

सत्तारूढ़ दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) उन याचिकाकर्ताओं में शामिल है जिन्होंने SIR प्रक्रिया की संवैधानिकता को चुनौती दी है। डीएमके का तर्क है कि यह प्रक्रिया चुनाव आयोग के अधिकारों के बाहर है और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (ROPA) के खिलाफ है। याचिका में दावा किया गया है कि SIR संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325 और 326 का उल्लंघन करता है। पार्टी को डर है कि इस प्रक्रिया के जरिए बड़े पैमाने पर वास्तविक मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया से बाहर किया जा सकता है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

असली मतदाताओं के हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता

सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया मनमानी न हो। कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह तकनीकी खामियों के आधार पर किसी का नाम काटने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दे। 10 दिनों की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण अवधि मतदाताओं को अपनी नागरिकता और पात्रता साबित करने का एक मौका प्रदान करती है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की शुचिता बनी रहे।

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