Nuclear Physics: वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में परमाणु हथियारों को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। हाल ही में अमेरिका ने चीन पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि वह अपनी ‘लो-यील्ड’ परमाणु परीक्षण साइटों पर गुप्त रूप से गतिविधियां संचालित कर रहा है। अमेरिका का दावा है कि यह अंतरराष्ट्रीय संधियों का स्पष्ट उल्लंघन है। हालांकि चीन इन दावों को सिरे से खारिज करता रहा है, लेकिन इन आरोपों ने दुनिया में हथियारों की एक नई और खतरनाक होड़ को जन्म दे दिया है। दूसरी ओर, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी अमेरिका का कड़ा विरोध जारी है। अमेरिका का तर्क है कि ईरान नागरिक परमाणु ऊर्जा की आड़ में गुप्त रूप से विनाशकारी हथियार विकसित कर रहा है, जो मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।

CTBT पर मंडराता खतरा और परीक्षणों की सुगबुगाहट
सबसे चौंकाने वाला और चिंताजनक पहलू यह है कि अमेरिका ने खुद भी परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करने के संकेत दिए हैं। दशकों से चले आ रहे परीक्षणों पर रोक (मोरेटोरियम) के बाद, यदि दुनिया की कोई भी महाशक्ति फिर से परीक्षण शुरू करती है, तो यह ‘व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि’ (CTBT) के अंत की शुरुआत हो सकती है। परमाणु हथियारों की यह दुनिया जितनी विनाशकारी है, उतनी ही वैज्ञानिक रूप से जटिल भी। ऐसे में यह समझना अनिवार्य है कि ये हथियार वास्तव में काम कैसे करते हैं और क्या इनकी भी कोई निश्चित उम्र होती है।
क्या परमाणु बम भी एक्सपायर होते हैं? जानिए इसके पीछे का विज्ञान
आम जनता के बीच यह धारणा प्रचलित है कि एक बार परमाणु बम बन गया तो वह सदियों तक घातक बना रहेगा। हालांकि, विज्ञान इस सोच के विपरीत है। परमाणु हथियारों की एक निश्चित ‘एक्सपायरी डेट’ होती है और इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण हैं:
1. रेडियोधर्मी क्षय (Radioactive Decay)
परमाणु बम का मुख्य आधार प्लूटोनियम या यूयूरेनियम होता है। यद्यपि प्लूटोनियम-239 का आधा जीवन (Half-life) लगभग 24,000 वर्ष है, लेकिन बम के भीतर अन्य सहायक घटक इतनी लंबी अवधि तक सक्रिय नहीं रहते। विशेष रूप से ‘ट्रिटियम’ (हाइड्रोजन का रेडियोधर्मी आइसोटोप), जो विस्फोट की शक्ति बढ़ाने के लिए उपयोग किया जाता है, उसका आधा जीवन केवल $12.3$ वर्ष है। इसका अर्थ है कि हर 12 साल में इसकी प्रभावशीलता आधी हो जाती है, जिससे बम की मारक क्षमता स्वतः कम हो जाती है।
2. भौतिक और रासायनिक क्षरण
परमाणु हथियार हजारों जटिल इलेक्ट्रॉनिक सर्किट, उच्च विस्फोटकों और प्लास्टिक बॉन्डेड सामग्रियों का एक बारीक संयोजन होते हैं। समय के साथ, बम के भीतर निरंतर होने वाले रेडियोधर्मी विकिरण के कारण इसके संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक घटक खराब होने लगते हैं। प्लास्टिक और रबर के हिस्से सख्त होकर टूटने लगते हैं और धातु के हिस्सों में रासायनिक परिवर्तन या जंग आने की संभावना बनी रहती है।
3. प्लूटोनियम पिट (Pit) की उम्र
परमाणु हथियार के कोर को ‘पिट’ कहा जाता है। शोधों से पता चला है कि प्लूटोनियम पिट समय के साथ अपनी आणविक संरचना बदलने लगते हैं। अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि एक परमाणु पिट की सुरक्षित और विश्वसनीय उम्र 50 से 100 वर्ष के बीच ही होती है। इसके बाद उसकी कार्यक्षमता पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
रखरखाव की भारी लागत: लाइफ एक्सटेंशन प्रोग्राम (LEP)
चूंकि परमाणु हथियार एक्सपायर होते हैं, इसलिए उन्हें सक्रिय रखने के लिए ‘लाइफ एक्सटेंशन प्रोग्राम’ (LEP) चलाया जाता है। अमेरिका जैसे परमाणु संपन्न देश हर साल अरबों डॉलर इन हथियारों के पुराने पुर्जों को बदलने और उन्हें आधुनिक बनाने पर खर्च करते हैं। इसमें पुराने ट्रिटियम को ताजे ट्रिटियम से बदलना, न्यूट्रॉन जनरेटर को अपडेट करना और कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए उनकी मारक क्षमता की जांच करना शामिल है। बिना उचित रखरखाव के ये हथियार केवल ‘रेडियोधर्मी कबाड़’ बनकर रह जाएंगे या भंडारण गृहों में बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकते हैं।
NPT और परमाणु संपन्न राष्ट्रों का वैश्विक वर्गीकरण
परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के आधार पर दुनिया के परमाणु संपन्न देशों को दो श्रेणियों में बांटा गया है:
मान्यता प्राप्त परमाणु शक्तियां: इसमें वे पांच देश (P5) शामिल हैं जिन्होंने 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु परीक्षण कर लिए थे। इनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस (सोवियत संघ के उत्तराधिकारी के रूप में), यूनाइटेड किंगडम (1952), फ्रांस (1960) और चीन (1964) शामिल हैं। ये सभी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य भी हैं।
NPT के बाहर के परमाणु संपन्न देश: इस श्रेणी में भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजरायल आते हैं। भारत ने 1974 और 1998 में सफल परीक्षण किए, हालांकि भारत NPT को भेदभावपूर्ण मानता है। वहीं, उत्तर कोरिया 2003 में संधि से बाहर होकर परमाणु शक्ति बना। इजरायल ने कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं की, लेकिन उसके पास बड़ा जखीरा होने की पुष्टि विशेषज्ञ करते हैं।
दक्षिण अफ्रीका की मिसाल और निशस्त्रीकरण की आवश्यकता
दक्षिण अफ्रीका दुनिया का एकमात्र ऐसा उदाहरण है जिसने परमाणु हथियार विकसित करने के बाद, 1990 के दशक में स्वेच्छा से उन्हें पूरी तरह नष्ट कर दिया। यह वैश्विक शांति की दिशा में एक बड़ा उदाहरण है। निष्कर्षतः, परमाणु हथियार न केवल सुरक्षा का एक महंगा साधन हैं, बल्कि मानवता के सिर पर लटकती एक निरंतर तलवार भी हैं। शांति का वास्तविक मार्ग परमाणु परीक्षणों की धमकी में नहीं, बल्कि आपसी संवाद और पूर्ण परमाणु निशस्त्रीकरण में ही निहित है। इन हथियारों की एक्सपायरी डेट भले ही बढ़ाई जा सकती है, लेकिन मानवता की दीर्घायु केवल इनके उन्मूलन में है।


















