Secularism in Constitution : केंद्र सरकार ने गुरुवार को राज्यसभा में स्पष्ट किया कि संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की कोई योजना या इरादा नहीं है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लिखित जवाब में कहा कि इस विषय पर कुछ समूहों की राय या सार्वजनिक चर्चा हो सकती है, लेकिन यह सरकार की आधिकारिक मंशा को नहीं दर्शाता। उन्होंने बताया कि इन शब्दों को 1976 में 42वें संविधान संशोधन के तहत जोड़ा गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन नवंबर 2024 में यह याचिका खारिज हो चुकी है।
यह मुद्दा उस वक्त चर्चा में आया जब आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर आरएसएस सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्दों को संविधान की मूल प्रस्तावना में नहीं होने की बात कही थी। इसके बाद पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस संशोधन की आलोचना करते हुए इसे संविधान के “पवित्र बीज” के साथ छेड़छाड़ बताया था।
26 जुलाई को धनखड़ ने बयान देते हुए कहा कि आपातकाल के दौरान प्रस्तावना में जोड़े गए ये शब्द संविधान की आत्मा से मेल नहीं खाते और इन्हें जबरदस्ती थोपा गया। उन्होंने इसे ‘नासूर’ कहा और कहा कि यह हजारों साल पुरानी भारतीय सभ्यता और मूल्यों का अपमान है। धनखड़ के अनुसार, संविधान की प्रस्तावना मूल आत्मा का प्रतीक है और इसमें बदलाव करना संविधान के साथ विश्वासघात जैसा है।
RSS नेता दत्तात्रेय होसबाले ने भी यह कहा था कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना में नहीं थे और इन्हें आपातकाल के दौरान जोड़ दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इन शब्दों को आज भी बनाए रखना चाहिए या इस पर फिर से विचार होना चाहिए। उन्होंने आपातकाल को लोकतंत्र की हत्या बताते हुए कहा कि उस दौर में एक लाख से ज्यादा लोगों को जेल में डाला गया था और लाखों की जबरन नसबंदी कराई गई थी।
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि BJP-RSS संविधान को कमजोर कर बहुजनों और गरीबों को उनके अधिकारों से वंचित करना चाहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी संविधान की जगह मनुस्मृति लागू करना चाहती है, ताकि देश को फिर गुलामी की ओर धकेला जा सके।
संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द का अर्थ है ऐसी व्यवस्था, जहां सभी को आर्थिक और सामाजिक समानता मिले, संसाधनों का समान वितरण हो और कमजोर तबकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए। वहीं, ‘धर्मनिरपेक्ष’ का मतलब है कि राज्य सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करेगा और किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेगा। ये सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना का हिस्सा हैं और इन्हीं पर देश की धर्मनिरपेक्ष और समावेशी पहचान टिकी हुई है।
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