Shaksgam Valley Dispute
Shaksgam Valley Dispute: जम्मू-कश्मीर की शक्सगाम घाटी को लेकर भारत और चीन के बीच कूटनीतिक तनाव एक बार फिर चरम पर है। चीन ने इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाके पर अपना दावा ठोकते हुए इसे अपना अभिन्न हिस्सा बताया है। बीजिंग की यह प्रतिक्रिया उस समय आई है जब चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत इस क्षेत्र में सड़क निर्माण और बुनियादी ढांचे के विकास की खबरें तेज हुई हैं। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने सोमवार को एक बयान में स्पष्ट रूप से कहा कि अपने अधिकार क्षेत्र में बुनियादी ढांचा तैयार करना चीन का संप्रभु अधिकार है और इस पर किसी भी विदेशी हस्तक्षेप या सवाल की कोई गुंजाइश नहीं है।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो शक्सगाम घाटी का मुद्दा भारत की संप्रभुता से जुड़ा है। 1948 में पाकिस्तान ने इस क्षेत्र पर अवैध कब्जा कर लिया था, जिसे बाद में 1963 के तथाकथित ‘चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते’ के तहत पाकिस्तान ने चीन को उपहार स्वरूप सौंप दिया। भारत ने इस समझौते को शुरू से ही सिरे से खारिज किया है। चीनी प्रवक्ता माओ निंग ने इसी समझौते का हवाला देते हुए कहा कि 1960 के दशक में दो संप्रभु देशों ने अपनी सीमाएं तय की थीं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत का रुख स्पष्ट है कि जो जमीन पाकिस्तान की थी ही नहीं, उसे किसी तीसरे देश को देने का उसे कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने चीन के इन दावों और शक्सगाम में चल रहे निर्माण कार्यों पर कड़ी आपत्ति जताई है। 9 जनवरी 2026 को हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने दोटूक शब्दों में कहा कि शक्सगाम घाटी भारत का अटूट हिस्सा है। भारत ने कभी भी 1963 के अवैध समझौते को मान्यता नहीं दी है। भारत का स्पष्ट मानना है कि यह पूरा क्षेत्र पाकिस्तान के जबरन और अवैध कब्जे (PoK) में है, इसलिए वहां किसी भी प्रकार का विदेशी निर्माण अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है। भारत ने दोहराया है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न अंग हैं और रहेंगे।
लगभग 60 बिलियन डॉलर की लागत वाला ‘चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (CPEC) चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना है। 2013 में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट चीन के शिंजियांग प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ता है। चीन इसे केवल एक आर्थिक और सामाजिक विकास की परियोजना बताता है, लेकिन भारत इसे चीन की ‘विस्तारवाद की नीति’ का हिस्सा मानता है। चूंकि यह कॉरिडोर गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे विवादित और भारतीय क्षेत्रों से गुजरता है, इसलिए भारत ने इसे अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर सीधा हमला करार दिया है।
चीन के लिए सीपेक का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। वर्तमान में चीन का 80% कच्चा तेल मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जो करीब 16,000 किलोमीटर का लंबा रास्ता है। सीपेक के पूरी तरह सक्रिय होने पर यह दूरी घटकर मात्र 5,000 किलोमीटर रह जाएगी। इसके अलावा, अरब सागर में ग्वादर पोर्ट तक पहुंच मिलने से चीन की नौसेना (PLA Navy) को हिंद महासागर में एक स्थायी ठिकाना मिल जाएगा। ग्वादर पोर्ट का इस्तेमाल चीनी युद्धपोतों की मरम्मत और रसद आपूर्ति के लिए किया जा सकेगा, जो सीधे तौर पर भारतीय समुद्री सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करेगा।
Tamil Nadu CM : तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय, जिन्हें प्रशंसक प्यार से 'थलापति…
Manipur Violence : मणिपुर में हाल ही में हुई चर्च के तीन पदाधिकारियों और एक…
Chandranath Rath Murder Case : पश्चिम बंगाल की राजनीति में भूचाल लाने वाले चंद्रनाथ रथ…
India A Squad: भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने आगामी 9 जून से श्रीलंका की…
Delhi WFH News: देश की राजधानी दिल्ली में प्रशासनिक व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण की दिशा…
Ambikapur News: छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मुख्यालय अंबिकापुर में प्रशासन ने अवैध अतिक्रमण के…
This website uses cookies.