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Shankaracharya Interview: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का साक्षात्कार, राजनीति, धर्म और गौ संरक्षण पर बेबाक राय

Shankaracharya Interview: उत्तराम्नाय बदरी पीठ के शंकराचार्य जगद्गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज सनातन धर्म के उन प्रखर स्तंभों में से हैं, जो अपने स्पष्ट और निर्भीक विचारों के लिए जाने जाते हैं। वे न केवल धर्मशास्त्रों के प्रकांड विद्वान हैं, बल्कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक की भी गहरी समझ रखते हैं। हाल ही में प्रयागराज माघ मेले की घटनाओं और काशी के धार्मिक स्वरूप में हो रहे बदलावों को लेकर वे चर्चा में रहे हैं। काशी के श्रीविद्या मठ में हुई एक विशेष वार्ता में उन्होंने देश की वर्तमान परिस्थितियों पर शास्त्रोक्त दृष्टिकोण साझा किया।

पॉलिटिक्स बनाम राजनीति: शब्दों का गिरता स्तर

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर कटाक्ष करते हुए शंकराचार्य जी ने कहा कि आज भारत में ‘राजनीति’ नहीं बल्कि ‘पॉलिटिक्स’ हो रही है। उनके अनुसार, ये दोनों शब्द एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। ‘राजनीति’ का अर्थ है राजा द्वारा प्रजा के कल्याण के लिए लागू की गई नीति, जबकि ‘पॉलिटिक्स’ एक विदेशी अवधारणा है। उन्होंने दुख जताया कि आज शब्द अपनी गरिमा खो रहे हैं। जब नेतृत्व निरंकुश हो जाए, तो शास्त्रों के अनुसार शब्दों की शक्ति से उसका प्रतिकार करना अनिवार्य है। यदि गलत को गलत नहीं टोका गया, तो तानाशाही प्रवृत्तियां जन्म लेती हैं।

काशी का कायाकल्प और पुराणों की शाश्वतता

काशी में हो रहे निर्माण कार्यों और प्राचीन विग्रहों के साथ छेड़छाड़ के आरोपों पर स्वामी जी ने अत्यंत दार्शनिक उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि ‘पुराण’ का अर्थ ही है— जो पुराना होकर भी नित्य नवीन रहे। इतिहास गवाह है कि औरंगजेब जैसे शासकों ने मंदिर तोड़े, लेकिन पुराणों में दर्ज स्मृति के कारण वे मंदिर पुनः स्थापित हुए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आधुनिकता या विकास के नाम पर आज जो भी प्राचीन देवालय या घाट तोड़े जा रहे हैं, वे भविष्य में पुराणों के माध्यम से ही अपने मूल स्थान पर पुनः प्रतिष्ठित होंगे।

संतत्व की परिभाषा और सरकारी वेतन पर सवाल

देश में संतों और मठों की बढ़ती संख्या पर टिप्पणी करते हुए शंकराचार्य जी ने एक गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों की अपनी मर्यादा है। आज कई मठों और अखाड़ों के प्रमुख स्वयं को संत या महामंडलेश्वर कहते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि इनमें से कुछ सरकार से वेतन प्राप्त कर रहे हैं। स्वामी जी का स्पष्ट मत है कि जो व्यक्ति सरकार के वेतन पर आश्रित हो, उसे संत, महात्मा या योगी नहीं कहा जा सकता। असली संत केवल ईश्वर के भरोसे रहता है, किसी सत्ता के नहीं।

सिनेमा में ब्राह्मणों का चित्रण और गौ माता का सम्मान

फिल्मों में ‘पंडित’ शब्द के अपमानजनक प्रयोग पर उन्होंने आपत्ति जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘पंडित’ का अर्थ विद्वान होता है, न कि केवल एक जाति विशेष। फिल्मों के शीर्षक अक्सर ब्राह्मण समाज को नीचा दिखाने के उद्देश्य से रखे जाते हैं, जो निंदनीय है। वहीं, गौ संरक्षण के मुद्दे पर उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को 40 दिनों की मोहलत दी है। उनका संकल्प गौ माता को ‘राष्ट्रमाता’ घोषित करवाना और गौवंश की हत्या को पूरी तरह बंद करवाना है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो वे कड़ा निर्णय लेंगे।

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