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Shankaracharya Controversy: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का प्रशासन को करारा जवाब, कहा- ‘संत चुनते हैं शंकराचार्य’

Shankaracharya Controversy: संगम तट पर छिड़ा धार्मिक और कानूनी संग्राम प्रयागराज में आयोजित माघ मेले में श्रद्धा के सैलाब के बीच एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच ठनी हुई है। प्रशासन ने स्वामी जी को नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर यह स्पष्टीकरण माँगा है कि वे स्वयं को ‘शंकराचार्य’ के रूप में कैसे प्रचारित कर रहे हैं। इसके जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि उनके पद की प्रामाणिकता सरकार या प्रशासन तय नहीं कर सकता, बल्कि यह सनातन धर्म की सर्वोच्च पीठों का आंतरिक निर्णय है।

“राष्ट्रपति या मुख्यमंत्री नहीं, शंकराचार्य तय करते हैं पद”

मेला प्रशासन के नोटिस पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने तीखा सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा, “क्या अब उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री या देश का राष्ट्रपति यह तय करेगा कि शंकराचार्य कौन है? भारत के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति को भी यह अधिकार नहीं है कि वह धर्म के आंतरिक पदानुक्रम में हस्तक्षेप करे।” उन्होंने जोर देकर कहा कि शंकराचार्य का निर्णय केवल अन्य पीठों के शंकराचार्य ही करते हैं और इस परंपरा में सरकारी हस्तक्षेप की कोई जगह नहीं है।

दो पीठों का समर्थन और पुरी की ‘मौन स्वीकृति’

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपनी दावेदारी को मजबूती देते हुए कहा कि उन्हें द्वारका पीठ और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्यों का प्रत्यक्ष, लिखित और व्यावहारिक समर्थन प्राप्त है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले माघ मेले में इन दोनों पीठों के शंकराचार्यों ने उन्हें अपने साथ लेकर शाही स्नान किया था। पुरी के शंकराचार्य के विषय में उन्होंने कहा कि वे इस मामले में ‘मौन’ हैं, जिसका अर्थ निषेध नहीं है। उन्होंने चुनौती दी कि यदि ज्योतिष पीठ पर कोई और दावेदार है, तो वह सामने आकर शास्त्रार्थ करे।

आधी रात को नोटिस चस्पा करने पर नाराजगी

विवाद तब और गहरा गया जब सोमवार देर रात मेला प्रशासन का अमला स्वामी जी के शिविर पहुँचा। स्वामी जी ने बताया कि प्रशासन ने रात के समय नोटिस देने की कोशिश की, जिसे सुबह लाने को कहा गया। लेकिन खुद को ‘कानूनगो’ बताने वाले अधिकारी ने शिविर के बाहर ही नोटिस चस्पा कर दिया। इस नोटिस में सुप्रीम कोर्ट की एक विचाराधीन अपील का हवाला देते हुए उनके ‘शंकराचार्य’ पद के उपयोग पर जवाब मांगा गया है। स्वामी जी ने इस कार्रवाई को दूषित भावना से प्रेरित बताया है।

कानूनी पक्ष: “सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें शंकराचार्य माना है”

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अधिवक्ता पी.एन. मिश्रा ने प्रशासन के नोटिस को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण बताया है। उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने किसी भी आदेश में यह नहीं कहा कि स्वामी जी ‘शंकराचार्य’ शब्द का उपयोग नहीं कर सकते। इसके विपरीत, न्यायालय की कई कार्यवाहियों में उन्हें इसी संबोधन से संबोधित किया गया है। वकील ने चेतावनी दी कि प्रशासन का यह नोटिस सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप है और इसके लिए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ ‘कमान्टेम्प्ट ऑफ कोर्ट’ (अदालत की अवमानना) की कार्रवाई की जा सकती है।

ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद की विरासत का सवाल

अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को विधिवत उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया था। प्रशासन द्वारा कोर्ट की अपील का गलत अर्थ निकालकर भ्रम फैलाया जा रहा है। स्वामी जी ने साफ कहा कि अगर कोई उनके पद पर सवाल उठाता है, तो वह शास्त्र और परंपरा की मर्यादा का उल्लंघन कर रहा है। फिलहाल, संगम की रेती पर यह विवाद सुलझने के बजाय और अधिक उलझता जा रहा है, जिससे माघ मेले के आध्यात्मिक माहौल में तनाव व्याप्त है।

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